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वित्त मंत्री जेटली का बजटीय भाषण तथा प्रस्तुत बजट

15 Jul

वित्त मंत्री जेटली के बजटीय भाषण तथा प्रस्तुत बजट ने जनता की आशाओं, उम्मीदों तथा आकांक्षाओं को निराशा में बदल दिया है। जो सरकार महँगाई छू मन्तर करने के वायदे के आधार पर सत्ता में आई, उसने सत्ता में आने के दो महीनों के अन्दर महँगाई कम करने के स्थान पर कमरतोड़ महँगाई बढ़ा दी। जेटली ने बजट में कीमती पत्थर, हीरा तथा पैक्ड फूड सस्ता कर दिया। मेरा सवाल है कि इससे देश के गरीब आदमी तथा नव मध्यम वर्ग को क्या फायदा पहुँचेगा। क्या यह देश के गरीब आदमी के साथ भद्दा मजाक नहीं है।

चुनावकेवल वायदों पर जीता गया। जीतने के बाद महँगाई कम करने के स्थान पर आशातीतमहँगाई बढ़ा दी गई। उसी प्रकार बजट केवल घोषणाओं से भरा है। सामाजिकसरोकारों की जिन योजनाओं के लिए वित्त मंत्री ने जिस राशि की घोषणा की है M_Id_475575_Arun_Jaitley_2उसको सुनकर लग रहा था कि यह भारत का बजट नहीं है, किसी महानगर का बजट है।कीमती पत्थर और हीरे सस्ते कर दिए, पैक्ड फूड सस्ता का दिया। बहुत अच्छाकिया वित्त मंत्री ने। अब देश का आम आदमी, जिसकोध्यान में रखकर बजट बनाने का दावा किया गया, बजट के बाद कीमती पत्थर औरहीरे तथा पैक्ड फूड खरीद सकेगा। पिछले साल चिदम्बरम के बजट के बाद जेटली नेबार बार कहा कि आयकर की छूट सीमा कम से कम 5लाख होनी चाहिए थी। अब क्याहुआ। ऊँट के मुँह में जीरा। देश पर अकाल की छाया मँडरा रही है। उससे निबटनेके लिए कोई सकारात्मक सोच नहीं है। बेरोजगारी दूर करने के लिए कोई सोचनहीं है। घर चलाने वाली महिलाओं की पीड़ा को कम करने की कोई सोच नहीं है।वोट आम आदमी के नाम पर। फायदा कॉरपोरेट घरानों को। सामाजिक सराकोरों से सम्बंधित 28 योजनाओं के लिए आपने सौ सौ करोड़ की लोलीपोप घोषणाएँ कर दीं। आप भारत का बजट पेश कर रहे थे अथवा अमृतसर शहर का बजट पेश कर रहे थे।

वित्त मंत्री जेटली ने खुद स्वीकारा था कि देश में आलू और प्याज की पैदावार भरपूर हुई है और देश में इनके दाम बढ़ने का कारण जमाखोरी है। हमने लिखा था कि हम जेटली के आकलन से सहमत हैं। हमने अपने लेख में लिखा था कि आखिरकारभाजपा ने भी यह स्वीकार कर लिया कि महँगाई का बहुत बड़ा कारण जमाखोरी एवंबिचौलिए हैं। सरकार का आकलन ठीक है। हम इससे सहमत हैं। हम बहुत पहले सेकहते और लिखते आए हैं कि किसान की किसी उपज को यदि उपभोक्ता दस रुपए मेंखरीदता है तो किसान को अपनी उपज का केवल दो रुपया ही मिल पाता है। उत्पादकएवं उपभोक्ता के अलावा बाकी का मुनाफा कौन चट कर जाता है। धूमिल की कविताकी पंक्तियाँ हैं -एक आदमी रोटी बेलताहै। एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी है। जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है। वह सिर्फ रोटी से खेलता है।विचारणीय है कि रोटी से खेलने वाला आदमी एकनहीं, वे अनेक बिचौलिए हैंजिनके अनेक स्तर हैं और हरेक स्तर पर मुनाफावसूली करने का धंधा होता है।रिटेल व्यापार में मिलावट करने, घटिया तथा डुप्लीकेट माल देने, कम तौलनेआदि की शिकायतें भी आम हैं। हमारी अर्थ व्यवस्था में जो दुर्दशा किसान कीहै वैसी ही स्थिति अन्य कामधंधों/ पेशों के कामगारों/ कारीगरों की है।सरकार ने कागजी व्यवस्था कर दी है कि किसान मण्डी में जाकर अपनी फसल सीधेग्राहक को बेच सकते हैं। इस व्यवस्था को असली जामा पहनाने की जरूरत है।किसान को मण्डी के कमीशन एजेन्टों के चंगुल से छुड़ाने के लिए मण्डी कीवर्तमान व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। यह नियम बनाना होगा कि किसान मण्डीमें बिना कमीशन एजेन्ट को मौटी रकम दिए प्रवेश कर सके तथा हर मण्डी मेंकिसानों को अपना माल बेचने के लिए स्थान बनाना होगा। यह व्यवस्था स्थापितकरनी होगी जिससे रोटी बेलने वाले तथा रोटी खाने वाले के बीच के बिचौलिएमुनाफावसूली का काला धंधा न कर सकें। इससे भाजपा पर जो आरोप लगता रहा है किभाजपा जमाखोरों एवं बिचौलियों की पार्टी है, उस आरोप के काले दाग धुलसकेंगे।

किसान तथा गाहक के बीच के मुनाफाखोर बिचौलियों, मण्डी के दलालों तथा जमाखोरों के शोषण से निजात दिलाने के लिए बजट में कोई ´विजन’ नहीं है। वित्त मंत्री कहते हैं कि किसान मण्डी में जाकर सीधे अपना माल ग्राहक को बेच सकते हैं। मगर किसान मण्डी में जाकर, एजेन्ट एवं दलालों को भेंट चढ़ाए बिना, अपना माल सीधे ग्राहक को बेच सकें – इसके लिए बजट में कोई दिशा अथवा प्रयास अथवा संकेत नहीं है। वित्त मंत्री जी, आप यह व्यवस्था कर दीजिए। महँगाई अपने आप कम हो जाएगी। मगर इसके लिए ´दृढ़ इच्छा शक्ति’ चाहिए। इसके लिए आम आदमी के सराकोरों को पूरा करने का जज्बा होना चाहिए।

दैनिक उपभोग की वस्तुओं की वस्तुओं की महँगाई को रोकने के लिए बजट में कोई ´विजन’ नहीं है। यह बजट देश के आम आदमी, घर चलाने वाली महिलाओं, बेरोजगारों तथा युवाओं की जन आकाक्षाओं को चूर चूर करने वाला है।

सत्ता प्राप्त करने के पहले भाजपा के नेता बार बार चिल्लाते थे कि गरीब किसानों को ब्याज मुक्त ऋण मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए। इस बजट में वह व्यवस्था नदारद है। यह बजट गरीब किसानों की आशाओं पर कुठाराघात है।

मोदी सरकार को मन मोहन सरकार का आभारी होना चाहिए कि मन मोहन सिंह की सरकार से मोदी की सरकार को विरासत में 698 लाख टन का खाद्यान्न भंडार मिला है। आप इसका बीस प्रतिशत भाग भी बाजार में उतार दीजिए। जमाखोरों की हालत पतली हो जाएगी। मगर इसके लिए भी ´दृढ़ इच्छा शक्ति’ चाहिए। जमाखोरों की नाराजगी को झेलने के लिए कलेजा चाहिए।

मन मोहन सिंह की सरकार और मोदी की सरकार के बजट में एक अन्तर जरूर है। मन मोहन सिंह की सरकार जो योजनाएँ कांग्रेसी नेताओं के नाम पर चला रही थी अब मोदी की सरकार उन्हीं योजनाओं को श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर चलाएगी। गाँवों को शहर से जोड़ने वाली ´प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना’ के अन्तर्गत चिदम्बरम ने जितनी धनराशि का प्रावधान किया था उसमें आपने जबर्दस्त कटौती अवश्य कर दी। यह दर्शाता है कि भारत के गाँवों और किसानों तथा मजदूरों के हितों के प्रति आप कितने गम्भीर हैं।

देश के आम बजट में महिलाओं की सुरक्षा के लिए 100 करोड़ का प्रावधान करते समय देश के वित्त मंत्री को शर्म नहीं आई। आप योजना का नाम गिनाने के लिए वित्तीय बजट पेश कर रहे थे। देश की महिलाओं की सुरक्षा की योजना के कार्यान्वयन और निष्पादन के लिए मोदी की सरकार कितनी संजीदा है- यह 100 करोड़ के झुनझुना से स्पष्ट है।

बजट में काले धन की उगाही के लिए किसी कार्यक्रम अथवा प्रयास अथवा योजना के लिए कोई दिशा संकेत नहीं है। आम चुनावों के दौरान अपने को भारत का ‘चाणक्य´ मानने वाले तथा अपने को बाबा कहने वाले सज्जन ने बार बार उद्घोष किया कि विदेशों में इतना कालाधन जमा है कि अगर मोदी जी की सरकार आ गई तो देश की तकदीर बदल जाएगी, बीस वर्षों तक किसी को आयकर देना नहीं पड़ेगा, हर जिले के हर गाँव में सरकारी अस्पताल खुल जाएँगे, कारखाने खुल जाएँगे, बेरोजगारी दूर हो जाएगी तथा देश की आर्थिक हालत में आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सोनिया गाँधी के इशारों पर चलने वाली सरकार के पास उन तमाम लोगों की सूची है जिनका काला धन विदेशों के बैंकों में जमा है। उस सूची कोसोनिया की सरकार जगजाहिर नहीं कर रही क्योंकि उस सूची में जिनके नाम हैं उनको यह सरकार बचाना चाहती है। आदि आदि।

अब तो मोदी की सरकार है। काले धन वालों की कोई सूची जग जाहिर क्यों नहीं की गई। क्या यह सरकार अपने लोगों को बचा रही है। कड़वी दवा पिलाने की जरूरत नहीं है। वर्ष 2014-2015 के अंतरिम बजट में कॉरपोरेट अर्थात् उद्योग जगत के लिए पाँच लाख करोड़ से अधिक राशि का प्रावधान किया गया है। निश्चित राशि है – 5.73 लाख करोड़। देश का वित्तीय घाटा इस राशि से बहुत कम है। सम्भवतः 5.25 लाख करोड़। कॉरपोरेट अर्थात् उद्योग जगत के लिए अतिरिक्त कर छूट के लिए निर्धारित अंतरिम बजट में जिस राशि का प्रावधान किया गया है उसको यदि समाप्त कर दिया जाता तो न केवल सरकार का वित्तीय खाटा खत्म हो जाता अपितु उसके पास पचास हजार करोड़ की अतिरिक्त राशि बच जाएगी। कॉरपोरेट जगत को दी गई कर रियायत को समाप्त करने की स्थिति में सरकार को डीजल के दाम बढ़ाने की जरूरत नहीं होती, रसोई गैस, पैट्रोल, उर्वरक, खाद्य सामग्री पर जारी सब्सिडी को कम करने के बारे में नहीं सोचना पड़ता (जिसको जनता के भारी विरोध को देखते हुए तीन महीनों के लिए स्थगित कर दिया गया है) तथा रेल का बेताहाशा तथा पूर्ववर्ती सभी रिकोर्डों को ध्वस्त करते हिए यात्री किराया तथा माल भाड़ा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती। हम भूले नहीं हैं कि चुनाव के नतीजे आने के बाद दिल्ली की आम सभा में जाकर वर्तमान वित्त मंत्री जेटली ने रामदेव की तुलना महात्मा गाँधी तथा जय प्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों से कर डाली। इससे जनता में यह संदेश गया कि नव निर्वाचित सरकार आते ही विदेशी बैंकों में अपना काला धन जमा करने वाले तमाम लोगों की सूची जाहिर कर देगी तथा सारा धन भारत आ जाएगा। इससे देश की तकदीर बदल जाएगी, बीस वर्षों तक हमें आयकर देना नहीं पड़ेगा, हर जिले के हर गाँव में सरकारी अस्पताल खुल जाएँगे, कारखाने खुल जाएँगे, बेरोजगारी दूर हो जाएगी तथा देश की आर्थिक हालत में आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। जनता को किसी कमीशन से मतलब नहीं होता। जनता को वे परिणाम चाहिएँ जिनके घटित होने का उसे बार बार आश्वासन मिल चुका था। यदि सरकार मानती है कि चुनावों में रामदेव ने जनता को भ्रमित किया था तो सरकार ने रामदेव के खिलाफ धोखाधड़ी का आपराधिक मुकदमा दायर क्यों नहीं किया। इसके विपरीत जेटली ने, जो भारत सरकार के वित्त मंत्री हैं, ने रामदेव की तुलना महात्मा गाँधी एवं जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों से करने का पाप कर्म कर डाला। सूची की बात जाने दीजिए। बजट में काले धन की उगाही के लिए संकेत भी नहीं है।

चुनावों में बार बार कहा गया कि देश हित में कठोर आर्थिक फैसलों को टालकर देश द्रोह का काम कर रही है। रेलके बढ़ाए गए किरायों में मुंबई की लोकल ट्रेनों के किरायों की बढ़ोतरी भीशामिल थी। महाराष्ट्र एवं मुम्बई के संसद सदस्यों एवं भाजपा के नेताओं नेअडिग मोदी से मुलाकात की तथा मोदी को समझाया कि इस निर्णय का महाराष्ट्रमें होने वाले विधान सभाओं के चुनावों पर विपरीत असर पड़ेगा। अपने निर्णयपर अडिग रहने वाले मोदी की सरकार ने मुंबई की लोकल ट्रेनों के बढ़े हुएकिरायों में कटौती की घोषणा कर दी। यदि मन मोहन सिंह की सरकार चुनावों कोध्यान में रखकर आर्थिक फैसलों को टाले तो वह देश की दुश्मन है और वही काममोदी की सरकार करे तो उसे किस उपाधि से नवाजा जाए।

बजट में, सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा के निर्माण के लिए 200 करोड़ का प्रावधान है। गुजरात के मुख्य मंत्री मोदी ने केशूभाई पटेल के वोट बैंक में सैंध लगाने के लिए सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने का संकल्प दौहाराया था। मोदी ने कहा था कि हम गुजरात में देश के लाखों किसानों के दान से प्रतिमा बनाएँगे। अब देश के बजट में 200 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस सम्बंध में, मैं यह कहना चाहता हूँ कि भारत के स्तर पर विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा सरदार पटेल की नहीं अपितु सरदार पटेल के आराध्य तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की बननी चाहिए।

आम आदमी को चाहिए कि वह अपना पेट भर सके। अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ा सके। बीमार होने पर अपना ईलाज करा सके। बेरोजगार को नौकरी चाहिए।वित्त मंत्री जी, आप बताइए कि इनके लिए आपके बजट में क्या है। वित्त मंत्री जी से उम्मीद थी कि वह बजट में जन आकांक्षाओं का ध्यान रखेंगे। देश में बजट से नई आशा एवं नए विश्वास का भाव पैदा होगा। मगर वित्त मंत्री जी ने क्या तस्वीर पेश की। आपने कहा कि अनिश्चितता की स्थिति है, इराक का खाड़ी संकट है, कमजोर मानसून की स्थिति है। उनके बजटीय भाषण ने आशा और विश्वास पैदा करने के स्थान पर घनघोर अंधकार और निराशा का वातावरण पैदा कर दिया। गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। परिणाम सबके सामने हैं। कॉरपोरेट घरानों को तमाम तरह की सुविधाएँ देने के बावजूद बजट के बाद शुरुआती चढ़ाव के बाद शेयर मार्किट में गिरावट देखने को मिली।

 
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Posted by on July 15, 2014 in Uncategorized

 

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