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‘एडमिरल गोर्शकोव’ से ‘आईएनएस विक्रमादित्य’ तक का सफ़र : हमने क्या खोया क्या पाया?

17 Jun

Vikramaditya1इस गौरवशाली भीमकाय एयरक्राफ्ट करियर को रूस ने 1987 में आधिकारिक तौर पर सेना शामिल किया. उस समयइसका नाम ‘बाकू’ रखा गया. सोवियत यूनियन के ख़त्म होने के बाद नवम्बर 1990 में इसी जहाज़ का नाम बदल कर ‘एडमिरल गोर्शकोव’ रखा गया.

1994 के शुरुआती समय में जहाज़ में स्टीम तैयार करने वाले बॉयलर में एक ज़बरदस्त विस्फोट हो जाने के कारण ये भीमकाय मशीन मरम्मत के लिए करीब डेढ़ साल तक बंदरगाह पर पड़ी रही.1995 के आखिर में इस युद्धपोत को फिर से सेना में वापस लाया गया पर अगले ही साल 1996 में इस जहाज़ के रख-रखाव और परिचालन में होने वाले भारी खर्च के कारण इस गौरवशाली भीमकाय जहाज़ को सेवानिवृत कर दिया गया. सेवानिवृत होने के बाद इस जहाज़ को बेचने के लिए छोड़ दिया गया.

वैसे तो इस युद्धपोत को भारत को बेचने की गहमागहमी 1994 में ही शुरू हो गयी थी, जब इस जहाज़ में हुए ब्लास्ट के कारण ये जहाज़ बंदरगाह पर मरम्मत के लिए पड़ा हुआ था. रूस को अंदाज़ा हो चला था कि अब वो जहाज़ ज्यादा समय का मेहमान नहीं है.

इधर भारत का अपना युद्धपोत विक्रांत 50 साल तक भारतीय नौसेना को अपनी सेवा देने के बाद 1997 के आखिर में सेवानिवृत हो गया था. ऐसे में एक अत्याधुनिक युद्धपोत की ज़रुरत भारत को भी थी. इसी समय रूस ने भारत को अपना युद्धपोत ‘एडमिरल गोर्शकोव’ ‘मुफ्त’ में देने की बात कही. बशर्ते कि भारत उस जहाज़ के आधुनिकीकरण, मरम्मत और उस युद्धपोत में पहले से मौजूद फाइटर प्लेन का खर्च दे दे.

भारत को ये ऑफर बड़ा भाया और नयी दिल्ली तुरंत हरकत में आ गयी. भारत ने नौसेना के अफसरों और वैज्ञानिकों का एक डेलीगेशन युद्धपोत की जांच के लिए रूस भेजा. जांच जल्दी पूरा करके जहाज को खरीदने के लिए हरी झंडी दे दी गयी. लेकिन सरकारी पचड़ो में ये डील होने में थोड़ी देर हो गयी.

सन 2000 में जहाज़ के मरम्मत आदि के कॉन्ट्रैक्ट की कीमत 400 मिलियन डॉलर यानी 24 अरब 48 करोड़ तय की गयी, लेकिन 2004 मे रूस ने ये दाम बढ़ाकर 1.5 बिलियन डॉलर यानी करीब 90 अरब 19 करोड़ 50 लाख रूपये कर दिया गया, जिसमें से 58 अरब 55 करोड़ 68 लाख 80 हज़ार रूपये ‘एडमिरल गोर्शकोव’ के मरम्मत के लिए और बाकी की राशि इस जहाज़ पर मौजूद 16 MIG-29K के मरम्मत के लिए था. इस पुरे प्रोजेक्ट को नाम दिया गया ‘प्रोजेक्ट 11430′.

जल्द ही रूस ने कीमत को फिर बढाने का फैसला किया, जिसके चलते भारत और रूस के रिश्तों में खटास आ गयी. अब तक जहाज़ को ‘मुफ्त’ में देने के नाम पर रूस भारत से 90 अरब 19 करोड़ 50 लाख वसूल चूका था, और अब वो इस कीमत को और बढ़ना चाहता था. रूस ने तर्क दिया कि मरम्मत के लिए हो रहे काम पर मार्केट का असर पड़ रहा है. रूस अब तक 2 कॉन्ट्रैक्ट तोड़ चूका था.

इसके बाद 2010 में फिर एक नयी डील की गयी, जिसमें इस पुरे युद्धपोत के नवीनीकरण की किमत 2.33 बिलियन डॉलर (करीब एक खरब 40 अरब 56 करोड़ 3 लाख) तय की गयी. इसके तहत भारतीय नौसेना को इस जहाज़ के संचालन की ट्रेनिंग देना और साथ में जहाज़ का ब्लू-प्रिंट देना भी शामिल था. पर 45 MIG-29K फाइटर प्लेन के लिए अलग से 2 बिलियन डॉलर (करीब 1 ख़रब 20 अरब 22 करोड़) रखा गया.

मतलब अब ये डील पुरे 4.33 बिलियन डॉलर यानी करीब 2 खरब 60 अरब 31 करोड़ 96 लाख का हो गया. रूस ने दिसंबर 2012 में सारा काम करके इस युद्धपोत को भारत को दे देने का वादा किया. पर जब सब कुछ ठीक करके इस जहाज़ का ट्रायल किया रूस ने तब फिर से जहाज़ के बॉयलर में खराबी आ गयी, जिससे इस जहाज़ की डिलीवरी 12 महीने और टली.

2008 में एक आर.टी.आई के जवाब में भारतीय नौसेना ने माना कि उन्होंने 2004 में बिना अच्छे से जांच किये 1.5 बिलियन डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी दे दी थी. यानी जांच अच्छे से ना हो पाने से कीमत का सही अंदाज़ा नहीं लगा पाए. इसीलिए बाद में जब काम शुरू हुआ तो ज्यादा खर्च आने लगे ज्यादा मशीने बदलने की ज़रुरत पड़ने लगी, जिससे कीमत बढ़ती चली गयी.

जहाज़ खरीदने की जल्दीबाजी में भारत ने अपनी बिगड़ती अर्थव्यवस्था में भी बहुत पैसे बर्बाद कर दिए. अगर सही समय पर सही कीमत का अंदाज़ा लगा पाते तो हो सकता था कि ये डील ही ना होती पर एक ग़लत आकलन से डील शुरू हुई तो कीमत बढ़ती चली गयी. भारत बीच में इस प्रोजेक्ट को छोड़ नहीं सकता था, नहीं तो तब तक के लगाए पैसे भी बर्बाद हो जाते.

खैर, इन सभी बाधाओं और गलतियों के बावजूद ‘एडमिरल गोर्शकोव’  ‘ INS विक्रमादित्य’ बनकर भारत आया. जनवरी 2014 के शुरुआती दिनों में और 15 जून 2014 भारत के नए प्रधानमन्त्री ने इसे देश को सौंपा.

आइये अब जानते हैं हमारी शान बने INS विक्रमादित्य के कौशल के बारे में :

284 मीटर लम्बे इस विशालकाय जहाज ने 22 डेक हैं. ये करीब 3 फूटबाल के मैदान की लम्बाई के बराबर है. इस जहाज़ का 40% हिस्सा ओरिजिनल ‘एडमिरल गोर्शकोव’ का ही है, जबकि बाकी हिस्सा नया है. ये जहाज करीब 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल सकता है. इस जहाज़ पर अभी करीब 36 लड़ाकू विमान रखे जा सकते हैं. जिसमें से अत्याधुनिक MIG -29k भी शामिल है, जो हर मौसम में उड़ान भरने की क्षमता रखता है.

इस वक़्त करीब 200 रुसी अधिकारी करीब 1600 भारतीय नौसैनिकों को इस भीमकाय जहाज़ को संचालित करना सिखा रहें हैं. इन 1600 सैनिकों के लिए हर महीने करीब 1 लाख अंडे, करीब 25 हज़ार लीटर दूध और करीब 20 टन चावल जहाज़ पर लादा जाता है. इसके आने से अरब सागर में भारत की मौजूदगी और मज़बूत हो जाएगी और ज़रुरत के समय जेट प्लेन को उड़ाने के लिए हवाई अड्डे की ज़रुरत नहीं पड़ेगी.

 
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Posted by on June 17, 2014 in Uncategorized

 

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