RSS

आप तो ऐसे न थे

03 May

विचार: संदीप पांडेय (मैगसेसे पुरस्कार विजेता)arvind with sandeep

भ्रष्ट्राचार पर चौराहे पर सरेआम फांसी पर लटका देने, वसूली सुनिश्चित करने से लेकर जेल में डाल देने का ऐलान करने वाली आम आदमी पार्टी के पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं पर जब भ्रष्टाचार के आरोप सही पाए गए तो उन्हें सिर्फ पार्टी से निष्कासित कर काम चला लिया गया.

इसी से पता चलता है कि आप की कथनी और करनी में कितना अंतर है. बाकी जगह भी तो यही होता है. किसी पर भ्रष्टाचार का आरोप सही पाया जाता है तो उसे निलंबित या ज्यादा से ज्यादा निष्कासित कर दिया जाता है. दूसरों के भ्रष्टाचार के खिलाफ आप के तीखे तेवर आखिर अपने लोगों के भ्रष्टाचार पर नरम क्यों है?

अवध प्रांत की संयोजिका अरुणा सिंह और हरदोई के कोषाध्यक्ष को पार्टी से निकाल दिया गया. जिस पार्टी का जन्म ऐसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से हुआ जिसका नेतृत्व अन्ना हजारे कर रहे थे, क्या उसमें ऊपर के संरक्षण के बिना कोई भ्रष्टाचार करने की हिम्मत कर सकता है? अरुणा सिंह को किसका संरक्षण प्राप्त था? यानी इस मायने में भी आप वैसी ही है जैसी अन्य पार्टियां.

भ्रष्टाचार की शिकायत सही पाए जाने पर किसी छोटे पदाधिकारी को बलि का बकरा बना कर ऊपर के लोगों को बचा लिया गया. सवाल यह भी है कि यदि अरुणा सिंह पर लगा आरोप सही पाया गया तो क्या उनके द्वारा लिए गए निर्णयों की समीक्षा नहीं होनी चाहिए और जो लोग उन्हें संरक्षण दे रहे थे क्या उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होनी चाहिए?

आप के जमीनी कार्यकर्ताओं में इस बात को लेकर काफी असंतोष है कि उत्तर प्रदेश के संयोजक ने स्थानीय स्तर पर कोई राय-मशविरा किए बगैर लोगों को टिकट देने में मनमानी की. उन्होंने अपने लोगों को उत्तर प्रदेश में संगठन के महत्वपूर्ण पदों पर बैठा रखा है. सवाल यह है कि पार्टी संजय सिंह की कार्यशैली क्यों बर्दाश्त कर रही है?
असल में देखा जाए तो अरविंद केजरीवाल भी इसी तरह के निर्णय ले रहे हैं. पहले उन्होंने घोषणा की थी कि वाराणसी का चुनाव वहां की जनता की राय लेकर लडेंगे. हालांकि सभी को पता था कि निर्णय क्या होगा?

यदि आप अपने ही लोगों की राय जानने की कोशिश करेंगे तो वे आपकी इच्छानुसार ही राय व्यक्त करेंगे. खैर, इस बार तो उन्होंने यह दिखावा करने की भी जहमत नहीं उठाई. कह दिया कि लोगों की राय बाद में ली जाएगी और बिना राय जाने ही वाराणसी से चुनाव लड़ने का निर्णय ले लिया. इससे उनके द्वारा पहले जनता के बीच लिए गए निर्णयों पर सवाल खड़े होते हैं.

आंदोलन के साथ पहले दिन से जुड़े प्रशांत भूषण की राय को पार्टी में दरकिनार किया जा रहा है. ऐसे में समझा जा सकता है कि बाद में जुड़े योगेंद्र यादव, आनंद कुमार और मेधा पाटकर आदि की निर्णय लेने की प्रक्रिया में कितनी भागीदारी होगी?

ये वे लोग हैं जो सामाजिक-राजनीतिक क्षेत्र में अरविंद केजरीवाल से ज्यादा अनुभवी हैं. यह आश्चर्य का विषय है कि पार्टी में ऐसी विभूतियों के होते हुए भी पार्टी के मुख्य नेताओं के रूप में इनको न प्रचारित कर मनीष सिसोदिया, कुमार विश्वास और संजय सिंह की तस्वीरें पोस्टरों पर होती हैं.

जिसने स्वराज के दर्शन को अपनी राजनीति का आधार बनाया और जिसकी लिखी स्वराज पुस्तक पार्टी में बाइबिल मानी जाती है उसी नेता ने आप की अवधारणा को फिलहाल व्यवहारिक कारणों से ताक पर रखने का फैसला किया है. स्वराज का दर्शन न तो विचारों में है और न ही कार्यप्रणाली में, क्या बाकी जगहों पर भी ऐसा ही नहीं होता?

कागज पर तो नियम-कानून और नीतियां श्रेष्ठतम बना ली जाती हैं, लेकिन क्रियान्वयन में समझौता होने लगता है जो अंतत: भ्रष्टाचार की जड़ बनता है. आप जिस चीज के खिलाफ लड़ने चली थी अब उसी का शिकार हो गई है और वह भी अपने गठन के एक वर्ष में ही. अब सवाल यह खड़ा होता है कि वे हजारों-लाखों कार्यकर्ता क्या करें जो आदर्शवाद में पहले आंदोलन और फिर पार्टी से जुड़े. कुछ ने तो पहले आंदोलन छोड़ा, कुछ अब पार्टी छोड़ रहे हैं.

असली समस्या उनकी है जो अभी भी आदर्शों के अनुरूप चलना चाह रहे हैं. जिस तरह अरविंद केजरीवाल ने अपना रास्ता तय किया उसी तरह आदर्शवादी कार्यकर्ताओं को अपना रास्ता खुद चुनना पड़ेगा. स्थानीय इकाइयों को स्वराज की अवधारणा के मुताबिक निर्णय लेकर उसे लागू करना चाहिए. अलोकतांत्रिक तरीके से ऊपर से थोपे गए निर्णयों को मानने से इन्कार कर स्थानीय स्तर पर सर्वसम्मति से खुली बैठक में तय किए गए उम्मीदवार को चुनाव लड़ाना चाहिए. आखिर एक केंद्रीकृत निर्णय लेने की प्रक्रिया की स्वीकृति क्यों जरूरी है? फिर सवाल यह उठेगा कि जब सभी अपना-अपना निर्णय लेंगे तो पार्टी एक कैसे रहेगी?

यदि पार्टी केंद्रीकरण का शिकार हो जाती है और उसी तरह से काम करने लगती है जैसे अन्य पार्टियां तो ऐसी पार्टी की जरूरत ही क्या है? लोग स्थानीय स्तर पर निर्णय लेकर अपना जनप्रतिनिधि चुनेंगे और उसे अपने प्रति जिम्मेदार बनाएंगे. ऊपर से चुना गया प्रतिनिधि तो ऊपरी नेतृत्व के प्रति ही जवाबदेह होगा. ऐसे में सवाल यह भी खड़ा होगा कि निर्णय स्थानीय स्तर पर होंगे तो क्या झगड़े नहीं होंगे? इसलिए ऊपर से दिशानिर्देश जरूरी हैं, किंतु स्वराज की अवधारणा में लोगों को इतना परिपक्व बनना पड़ेगा कि वे मिल-बैठकर निर्णय ले सकें.

जहां तक मतभेदों का सवाल है वे तो ऊपर भी हैं. कुछ खुलकर सामने आ चुके हैं. जैसा कि मधु भादुड़ी ने प्रकट किया. कुछ विभिन्न कारणों से फिलहाल दबे हुए हैं. कई लोग यह मान रहे हैं कि प्रयोग में गड़बड़ी होते हुए भी एक अभिनव हस्तक्षेप के रूप में इसका समर्थन किया जाना चाहिए.

कई मान रहे हैं कि नरेंद्र मोदी को कोई रोक सकता है तो आप ही है. कुछ निहित स्वार्थ और अवसरवाद के कारण भी आप से जुड़े हुए हैं. यदि अरविंद केजरीवाल का इंजिन पटरी से उतर गया है तो उसका डिब्बा बने रहना जरूरी नहीं. जरूरत है अपने आदर्शों को जीने की और जो सपना केजरीवाल ने दिखाया है उसे साकार करने की.

 
Leave a comment

Posted by on May 3, 2014 in Uncategorized

 

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: