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सबको खारिज करने का अधिकार

20 Apr

1961 के चुनाव कराने सम्बन्धित अधिनियम की धारा 49 (ओ) के तहत भारतीय मतदाता को यह भी अधिकार दिया गया है कि यदि वह समझता है कि कोई भी प्रत्याशी उपयुक्त नहीं है तो वह अपना मत किसी को न दे और इस बात को प्रारूप 17 ए पर दर्ज कराए. यानी भारतीय नागरिक को मत देने के अधिकार के साथ-साथ मत न देने का भी अधिकार दिया गया है.

कल्पना करें कि सबसे ज्यादा मत पाने वाले उम्मीदवार से ज्यादा मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प चुनते हैं. सैद्धांतिक रूप से इसका अर्थ होगा कि उस चुनाव क्षेत्र में ज्यादा मतदाता यही समझते हैं कि कोई उम्मीदवार चुना जाने लायक नहीं है. ऐसी दशा में चुनाव रद्द करा कर फिर से कराए जाने चाहिए, जिसमें पिछली बार खड़ा कोई भी प्रत्याशी पुनः खड़ा न हो.

यही बात राजनीतिक दलों के लिए खतरे की बात है. कहीं ऐसा न हो कि बड़े पैमाने पर जनता राजनीतिक दलों व उनके उम्मीदवारों को खारिज करना शुरू कर दे. अधिकारी भी अभी वर्तमान व्यवस्था के बदलाव के पक्ष में नहीं हैं. उनका निहित स्वार्थ इसी में है कि वर्तमान समय में मौजूद भ्रष्ट व्यवस्था ही कायम रहे. इसका प्रमाण है मतदान कराने हेतु जिम्मेदार अधिकारियों- कर्मचारियों का मतदाता के प्रति रवैया.

11 फरवरी, 2012, को गाजीपुर जिले के मोहम्मदाबाद विधान सभा क्षेत्र के मुर्की कलां मतदाता केन्द्र पर जब स्वतंत्र पत्रकार व वकील खान अहमद जावेद एवं उनकी पत्नी राजदा जावेद ने इस अधिकार का इस्तेमाल करने की मंशा प्रकट की तो सेक्टर इन्चार्ज उनसे माफी मांगने लगा कि उसके पास प्रारूप 17 ए उपलब्ध नहीं है. वह जावेद युगल से गुजारिश करने लगा कि वे इस विकल्प कर इस्तेमाल न करें.

दो घंटों तक बहस करने के बाद अंततः जावेद युगल ने हार मान कर अपना मत मजबूरी में किन्हीं को डाल ही दिया. 11 फरवरी को ही गोरखपुर में जरूर 97 लोग इस अधिकार का इस्तेमाल करने में सफल रहे. किन्तु यह तभी संभव हुआ जब महाराणा प्रताप डिग्री कालेज के प्राचार्य प्रदीप राव ने मतदान केन्द्र पर काफी हंगामा किया.

19 फरवरी को उन्नाव जिले में भगवंत नगर विधान सभा क्षेत्र में स्वतंत्र पत्रकार नागेश त्रिपाठी को पूरे दिन बेथर में मतदान केन्द्र संख्या 79 पर बैठाए रखने के बाद वहां उपस्थित अधिकारी ने कहा कि उसी रजिस्टर पर दर्ज कर दें कि अपना मत किसी को नहीं देना चाहते, जिस पर सभी मतदाता हस्ताक्षर कर रहे थे.

बॉबी रमाकांत को लखनऊ पूर्वी क्षेत्र में कुछ देर भ्रमित करने के बाद अधिकारियों ने बताया कि उनके पास प्रारूप 17 ए उपलब्ध नहीं है. उनसे कहा गया कि मतदान की प्रकिया में व्यवधान उत्पन्न न करें. अंततः बॉबी को अपना मत किसी उम्मीदवार को देना पड़ा क्योंकि मत देने हेतु उनसे धोखे से शेष प्रक्रियाएं, जैसे रजिस्टर पर हस्ताक्षर कराना, उंगली पर स्याही लगाना, आदि, पूरी करा ली गईं थीं.

इसी मतदान केन्द्र पर जब थोड़ी देर बाद राहुल द्विवेदी ने अपने इस अधिकार का इस्तेमाल करना चाहा तो उनसे कहा गया कि जिस रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर रहे हैं वहीं पर लिख दें कि वे अपना मत किसी को नहीं देना चाहते. इसी चुनाव क्षेत्र के इंदिरा नगर, सी ब्लॉक स्थित रानी लक्ष्मीबाई विद्यालय में जब सुधाकर रेड्डी ने इस अधिकार का इस्तेमाल करना चाहा तो वहां उपस्थित अधिकारी अनिल ने ऐसे किसी नियम के बारे में अनभिज्ञता प्रकट की. सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें बाहर जा कर शिकायत करने की सलाह दी तो किसी अधिकारी ने कहा कि उप-जिलाधिकारी के आने पर शिकायत दर्ज होगी.

जब सुधाकर ने अपनी पत्नी को परेशान होते हुए देखा तो उन्होंने भी इस सोच से कि मत बेकार न जाए मजबूरी में किसी उम्मीदवार को अपना मत दे ही दिया. सीतापुर के हरगांव विधान सभा क्षेत्र में यदि पत्रकार एम.आर. शर्मा ने पर्वेक्षक से बात कर हस्तक्षेप न किया होता तो झरीखापुर विद्यालय के मतदान केन्द्र संख्या 115 व 116 से कक्षा पांच उत्तीर्ण शांति व संत राम, जो 49 (ओ) के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहते थे, को वापस भेजा जा रहा था. इस क्षेत्र से कुल 283 लोगों ने अपने सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का इस्तेमाल किया.

लखनऊ में ममता सिंह ने न्यू हैदराबाद कालोनी स्थित मोतीलाल नेहरू इण्टर कालेज में मतदान केन्द्र संख्या 219 पर जब सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का इस्तेमाल करना चाहा तो वहां उपस्थित अधिकारी माफी मांगते हुए गिड़गड़ाने लगे कि वे इसके लिए आग्रह न करें और किसी को अपना मत दे दें.

इसी तरह बक्शी के तालाब विधान सभा क्षेत्र के मटियारी मतदान केन्द्र पर छात्र पवन सिंह को कहा गया कि जब अपना मत बेकार ही करना है तो किसी भी ऐरे गैरे को डाल दीजिए. पवन ने अंततः अपना मत एक छोटे दल के प्रत्याशी को डाला जिसके जीतने की कोई सम्भावना नहीं है.

यह बड़ी अजीब बात है कि मतदाता जागरूकता को तो अच्छा समझा जाता है. लेकिन क्या मतदाता जागरूकता इतना भर है कि हम घर से निकल कर किसी को भी मतदान कर आएं? अधिकारियों को अभी यह लगता है यदि कोई मतदाता धारा 49 (ओ) के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहे तो उनका काम बढ़ जाएगा.

मुख्य चुनाव आयुक्त कह चुके हैं कि अब वक्त आ गया है कि सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का क्रियान्वयन हो. इसका सबसे कारगर तरीका होगा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर आखिर में इस विकल्प हेतु एक बटन उपलब्ध कराना.

दूसरा यह नियम बनाना कि यदि सबसे ज्यादा मत पाए उम्मीदवार से भी ज्यादा लोग सभी उम्मीदवारों को खारिज करने वाला बटन दबाते हैं तो चुनाव रद्द कर पुनः नए उम्मीदवारों के साथ मतदान कराना जिसमें पिछली बार खड़े प्रत्याशियों पर प्रतिबंध हो. इस प्रकिया से जनता अंततः सही उम्मीदवार को चुन लेगी और तमाम अवांछनीय प्रत्याशी खारिज कर दिए जाएंगे.

मत देना तो जागरूक मतदाता की पहचान है लेकिन यदि आप किसी को मत न देने का अधिकार इस्तेमाल करना चाहें तो ऐसी टिप्पणी की जाती है कि क्या सबसे ज्यादा जागरूक आप ही हैं? या फिर यह कहा जाता है कि किसी को मत नहीं देना है तो यहां आए ही क्यों हो? इससे तो अच्छा होता कि घर बैठते. अधिकारियों की सोच इस मामले में अभी मतदाता के प्रति नकारात्मक है.

इस विडम्बना को सबसे अच्छी तरह उ.प्र. के एक ईमानदार आई.ए.एस. अधिकारी अभिव्यक्त करते हैं, जिनका कहना है कि इतना जोर लगा कर यह तो सुनिश्चित कर लिया जाता है कि मतदान एकदम निष्पक्ष और बिना गड़बड़ी के हो लेकिन जब जनता के सामने चुनने के लिए विकल्प ही ठीक न हो तो दुर्भाग्य यह है कि ठीक प्रक्रिया से अंततः एक गलत व्यक्ति ही चुन कर आता है. अधिकारियों को यह समझना होगा कि सभी उम्मीदवारों को नकारना भी एक किस्म की राजनीति है. यह जनता की राजनीति है जो राजनीतिक दलों के खिलाफ जाती है.

असल में देखा जाए तो भ्रष्ट एवं आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को चुनाव के मैदान से बाहर करने का यह बहुत कारगर औजार हो सकता है. यदि जनता तय कर ले कि सभी अवांछनीय लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जाए तो बड़े पैमाने पर लोग सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं. और राजनीतिक दल भी फिर इस डर से कि कहीं जनता उनके उम्मीदवारों को नकार न दे सही किस्म के लोगों को उम्मीदवार बनाना शुरू करेंगे.

अभी तो उनको मालूम है कि जनता की मजबूरी है कि उसे उन्हीं में से किसी एक को चुनना है. इसलिए दल जनता की भावना को धता बताते हुए भ्रष्ट एवं अपाराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को ही उम्मीदवार बनाते हैं.

 
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Posted by on April 20, 2012 in Uncategorized

 

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