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बाबा बनाते चैनल

20 Apr

जब अन्ना बाबा टेलीविजन के सेट पर उभर रहे थे अपने आंदोलन के साथ, जब रामदेव बाबा अपनी भ्रष्टाचार के खिलाफ यात्रा में व्यस्त थे, जब श्रीश्री रविशंकर जीवन जीने की कला के विस्तार में व्यस्त थे, श्री मोरारी और श्री आशाराम बापू द्वय टीवी पर अपने प्रवचन में व्यस्त थे, उसी दौरान एक व्यक्ति जूनियर आर्टिस्ट्स के साथ खुद के लांच करने का पहला चरण पूरा कर चुका था.

अन्ना के आंदोलन को लेकर यह बहस लंबी चली कि इस आंदोलन को मीडिया ने खड़ा किया है अथवा यह कोई जन आंदोलन है. लेकिन बाबा निर्मल को लेकर कोई बहस नहीं है कि वे मीडिया द्वारा खड़े किए गए जीन्न हैं या वास्तविक आध्यात्मिक सन्यासी ? यह आध्यात्मिक गुरू किसी को भी पैसे लिए बिना अपना दर्शन नहीं देता.

आशाराम बापू ने एक बार इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए ‘कुता’ शब्द का इस्तेमाल किया था, जिसके सामने बोटी फेंककर कुछ भी करवाया जा सकता है. उन दिनों आशाराम के आश्रम से मीडिया में उन्हें अच्छी ना लगने वाली कुछ खबरें आ रही थीं. उस समय आम आदमी यही समझ रहा था कि मीडिया अपना कर्तव्य निभा रहा है. लेकिन पेड न्यूज खबर छपने और ना छपने से अब एक कदम आगे बढ़ गया है. अब खबर के फालोअप ना करने के भी पैसे वसूले जा रहे हैं. पत्रकारिता और धंधा के बीच खींची हुई स्पष्ट लकीर को पहले महीन किया गया और ना जाने यह लकीर कब मिट गई.

अनुमान है कि महीने के दस करोड़ के खर्च पर देश के तीस चैनल बाबा की उपस्थिति का उत्सव मना रहे हैं. इन चैनलों और पैसों की अकूत ताकत ने बाबा को पवित्र गाय बना रखा है. यदि बाबा में आध्यात्मिक शक्ति होती तो कानूनी नोटिस की जगह आध्यात्मिक शक्ति का उपयोग करते. खुद पर उठ रहे एक-एक जुबान को बंद करने की कोशिश की जगह कोई ऐसा चमत्कार करते कि सबकी जुबान खुद बंद हो जाती.

पीपरिया मध्य प्रदेश की एक दूकान पर देवी पार्वती, ईश्वर शिव और बाबा साईं से भी अधिक पोस्टर बाबा निर्मल का दिखा. पोस्टरों के दिखने से भी अधिक दिलचस्प दूकान वाले का जवाब था- जो बिकेगा वही तो रखेंगे.

इस जवाब में कुछ नयापन नहीं है लेकिन इस जवाब में कुछ तो बात है, जिसका हवाला पटरी बैठा एक पोस्टर वाला भी दे रहा है और दिल्ली की एक बहुमंजिली इमारत में बैठे एक चैनल का सीईओ भी दे रहा है. बेचने का फार्मूला दोनों का एक ही है.

वास्तविकता यही है कि निर्मल बाबा की वजह से दस करोड़ महीने का जब आम मिल रहा है और टीआरपी के तौर पर गुठलियों का दाम भी वसूल हो रहा है, ऐसे में आप किसी टीवी चैनल वाले से पत्रकारिता के मूल्यों पर बात करेंगे तो आपको मुख्य धारा का कोई भी गंभीर पत्रकार गंभीरता से लेने को तैयार नहीं होगा. क्योंकि अब पत्रकारिता बदल गई है. प्रतिस्पर्धा पहले से बढ़ गई है. यह बिरला का नहीं, अंबानी का मीडिया युग है. तय है, बदलते युग में मूल्य भी बदलेंगे और नए मूल्य वही तय करेगा, जो इस दौड़ में सबसे आगे होगा.

निर्मल दरबार के नेहरू प्लेस वाले दफ्तर कम बीपीओ में गया था. बाबा के मीडिया सेल के बारे में पता करने. वहां बताया गया कि बाबा जब सारी मीडिया में आ रहे हैं, फिर उन्हें मीडिया सेल की क्या जरूरत है? यदि बाबा के नेहरू प्लेस वाले दरबार में सीसी टीवी लगा हो तो कोई भी छह अप्रैल दोपहर दो और तीन के बीच में यह फूटेज देख सकता है, जिसमें बाबा की प्रतिनिधि महिला कहती है कि बाबा के भक्त बड़े बड़े नेता मंत्री हैं, केरल के मुख्यमंत्री भी बाबा के सामने सिर झुकाते हैं. बाबा प्रतिनिधि यह बताने में असफल रही कि वह किस मुख्यमंत्री की बात कर रही हैं? दोनों हाथों से बाबा के ग्राहकों द्वारा पैसा बटोरने जैसे महत्वपूर्ण काम को करते हुए, बाबा प्रतिनिधि ने मुझसे बात की, इसके लिए उन्हें साधुवाद कहकर निकल गया.
“सिख धर्म के ग्रंथों में साफ-साफ कहा गया है कि करामात कहर का नाम है. इसका मतलब है जो भी करामात कर अपनी शक्तियां दिखलाने की कोशिश करता है, वो धर्म के खिलाफ काम कर रहा है. निर्मल को कई दफा यह बात मैंने समझाने की कोशिश भी की, लेकिन उसका लक्ष्य कुछ और है, उसको मैं क्या कह सकता हूं.”

यह बात झारखंड के एक वरिष्ठ राजनेता इंदर सिंह नामधारी ने एक वेबसाइट से बात करते हुए बताया. निर्मल बाबा ने अपने जीवन के बहुत बरस झारखंड के पलामू में गुजारे हैं. इंदर सिंह नामधारी की पहचान झारखंड के कद्दावर और समझदार नेताओं की रही है. निर्मल बाबा इन्हीं नेताजी के साले हैं. माने इंदर सिंह नामधारी की पत्नी मनविन्दर कौर के सगे भाई हैं.

नामधारी ने स्वीकार किया कि निर्मलजीत सिंह नरूला का कॅरियर बनाने में उन्होंने प्रारंभ में काफी मदद की है. निर्मलजीत सिंह नरूला के पिता और नामधारी के ससुर दिलीप सिंह बग्गा बहुत पहले गुजर गए. बेसहारा हुए निर्मलजीत सिंह नरूला को नामधारी अपने साथ ले आए. उसकी मदद तरह-तरह से की, लेकिन कोई धंधा जब सफल नहीं हुआ तो एक दिन निर्मलजीत सिंह नरूला, निर्मल बाबा बन गये.

इस पूरी कहानी में इस पक्ष को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता, कि अन्ना के आंदोलन के बाद समाज में साधु संन्यासियों की प्रतिष्ठा एक बार फिर बढ़ गई थी, क्योंकि इस आंदोलन में जनभावना को समझते हुए जन आंदोलनकारी की भूमिका में संन्यासी आए थे. अब साधु-संन्यासियों की समाज में बढ़ रही प्रतिष्ठा राजनीति में सक्रिय लोगों के लिए बड़ी चुनौती बन गई थी. ऐसे समय में एक ऐसे संन्यासी की जरूरत राजनीति को भी थी, जो सिर्फ पैसे की भाषा जानता हो. जो पैसे लिए बिना दर्शन भी ना देता हो और अच्छी रकम दो तो अकेले में भी मिलने को तैयार हो जाता हो.

बाबा को पूरी तरह ताम-झाम से लांच करने के लिए माध्यम भी वही चुना गया, जिसकी वजह से अन्ना देश के बच्चे-बच्चे की जुबान पर आ गए. इसी माध्यम ने झारखंड में कई धंधों में असफल हो चुके निर्मलजीत सिंह नरूला को समाज की चर्चा के केन्द्र में ला दिया. वैसे आधिकारिक तौर पर निर्मल बाबा ने अभी तक अपने संबंध में लोगों को कुछ बताया नहीं है. यहां तक कि बाबा जी की वेबसाइट पर भी इनके अतीत के बारे में कुछ भी दर्ज नहीं है.

जो जानकारी उपलब्ध है, उसके अनुसार निर्मल बाबा दो भाई हैं. बड़े भाई मंजीत सिंह अभी लुधियाना में रहते हैं. निर्मल बाबा छोटे हैं. पटियाला के सामना गांव के रहनेवाले. 1947 में देश के बंटवारे के समय निर्मल बाबा का परिवार भारत आ गया था. बाबा शादी-शुदा हैं. एक पुत्र और एक पुत्री हैं उनकी. मेदिनीनगर (झारखंड) के दिलीप सिंह बग्गा की तीसरी बेटी से उनकी शादी हुई. चतरा के सांसद और झारखंड विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी के छोटे साले हैं ये. बकौल श्री नामधारी, 1964 में जब उनकी शादी हुई, तो निर्मल 13-14 वर्ष के थे. 1970-71 में वह मेदिनीनगर (तब डालटनगंज) आये और 81-82 तक वह यहां रहे. रांची में भी उनका मकान था. पर 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद भड़के सिख विरोधी दंगे के बाद उन्होंने रांची का मकान बेच दिया और चले गये. रांची के पिस्का मोड़ स्थित पेट्रोल पंप के पास उनका मकान था. निर्मल बाबा का झारखंड से पुराना रिश्ता रहा है. खास कर पलामू प्रमंडल से. 1981-82 में वह डालटनगंज में रह कर व्यवसाय करते थे. चैनपुर थाना क्षेत्र के कंकारी में उनका ईंट-भट्ठा भी हुआ करता था, जो निर्मल ईंट के नाम से चलता था. लेकिन धंधा चला नहीं.

लेकिन यह चमत्कार भारत में ही संभव है कि खुद कई धंधों में असफल रहा व्यक्ति आज की तारीख में दूसरों की असफलता हरने का दावा कर रहा है. लेकिन क्या बाबा कोई आध्यात्मिक काम कर रहे हैं ? यह लाख टके का सवाल है और इसका जवाब ना में ही है.

बाबा में यदि वास्तव में आध्यात्मिक ताकत है तो उन्हें पारदर्शी होना चाहिए. बाबा को अपनी वेबसाइट पर आने वालों की पूरी सूची प्रकाशित करनी चाहिए. पूजा, पाठ, दसवंद के नाम पर जो कमाई है, उस पर बाबा कितना आयकर दे रहे हैं? इसका राज खुलना चाहिए. यदि उनका दरबार किसी एनजीओ या ट्रस्ट के मार्फत चल रहा है तो समाज की भलाई के लिए वह कहां और क्या काम कर रहा है? बाबा यह सारी जानकारी अपने भक्तों से छुपा क्यों रहे हैं? भक्तों की इतनी कृपा जो उन पर है, वो लगभग प्रति दिन चार करोड़ रुपए बैठती है. चूंकि आमदनी की आधिकारिक जानकारी निर्मल दरबार नहीं देता, इसलिए यह रकम भी अनुमान से ही बताई जा रही है. जब निर्मल दरबार से इसकी जानकारी मिलेगी तो फिर सही-सही आंकड़ा आपके सामने आ पाएगा.

बाबा निर्मल पर इतने सवाल इसीलिए उठ रहे हैं क्योंकि वे खुद को आध्यात्मिक पुरुष कहते हैं. पैसों का इतना चाव है कि बिना पैसों के दर्शन भी नहीं देते हैं. यदि निर्मल बाबा कहें कि वे एक धंधेबाज हैं और निर्मल दरबार एक धंधा है, तो फिर उनसे कोई शिकायत नहीं रहेगी.

यह बात बाबा के पक्ष में कही जा रही है कि दान स्वरूप जो पैसा बाबा को चढ़ाया जाता है, इससे हमारे अंदर त्याग बढ़ता है. हिन्दू और सिख समाज में त्याग का बड़ा महत्व है. लेकिन इस बात को कोई स्पष्ट करे कि स्वयं बाबा तो तमाम तरह के पैसों के कारोबार में लिप्त रहें, समाज से हो रही आमदनी का हिसाब समाज को ही ना दें और समाज को त्याग का पाठ पढ़ाएं. यह बात जमती नहीं है. लोगों के धन से स्वयं अरबपति हो जाएं और श्रद्वालू पैसे देने के बाद भी महज दिलासा लेकर ही घर लौटें. तकलीफ कब तक दूर होगी, इसकी कोई समय सीमा भी तो बाबा नहीं देते हैं.

यदि बाबा निर्मल में इतनी चमत्कारी शक्तियां हैं तो उन्हें यूएस की वेवसाइट हबपेजेज को नोटिस भेजने की क्यों जरूरत आन पड़ी? उन्हें न्यायालय की शरण में क्यों जाना पड़ा? इसी तरह की शिकायत उनको इंडी जॉब्स के खिलाफ भी करनी पड़ी. इन वेबसाइटस पर उनको संदेहास्पद गुरू कहा गया था, जो काला जादू चलाता है और वशीकरण का मंत्र जानता है. बाबा के नोटिस के जवाब में वेब पोर्टल ने लिखा कि एक पब्लिक फीगर के लिए वे अपनी अलग राय रख सकते हैं.

आप इस कहानी को इस तरह समझिए, बाबा निर्मल की जगह कोई गिरा हुआ दो कौड़ी का आदमी जो कभी झारखंड में ठेकेदारी करता था, सड़क बनवाता था, एक रात बाबा हो जाए, मुम्बई के जुनियर आर्टिस्ट टीवी पर आकर बाबा की तारिफ करें और एक दिन यह दो कौड़ी का आदमी पटना में समागम करे, अपनी जालसाज आंखों का हवाला देकर यह चोर आने वाले व्यक्तियों से यह कहे कि आपके यहां धोती या लूंगी कौन पहनता था? बिहार में ऐसा कौन-सा परिवार होगा, जिसके रिश्तेदारों में दूर-दूर तक कोई धोती लूंगी पहनने वाला कोई व्यक्ति ना हो. इसी तरह की गोल-मोल बातें कर इस तरह के किसी भी जालसाज, चोर, लंपट तथाकथित बाबाओं को चैनलों पर प्रमोट किया जा सकता है.

वैसे बाबा निर्मल ऐसे लोगों से बेहतर हैं. फिर भी थर्ड आई मुझे फ्रॉड आई प्रतीत होता है. यह मेरा व्यक्तिगत मत है, यदि इससे किसी की भावना आहत होती है तो माफ कीजिएगा लेकिन जो चैनल पैसा लेकर बाबा को प्रमोट कर रहे हैं, ऐसे चैनलों को समाज को माफ नहीं करना चाहिए.

 
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Posted by on April 20, 2012 in Uncategorized

 

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