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संसद, कानून और जनता

04 Sep

पश्चिमी राजनीतिक और विधिशास्त्रीय चिंतन में थॉमस हॉब्स और जॉन ऑस्टिन के ‘संप्रभु’ की संकल्पना को हमारे विधिवेत्ताओं ने जिस रूप में भी समझा हो, हमारे पेशेवर राजनीतिज्ञों और इस देश के सर्वसाधारण के लिए इस गुत्थी का सुलझना आज बेहद जरूरी हो गया है. क्योंकि कानून, और इसे बनाने तथा लागू करने का प्रक्रिया का सारा कार्य-व्यापार आज भी इस देश में इसी ‘संप्रभुता’ के एक अर्द्ध-सत्य के सहारे चलाया जा रहा है. वकीली के जरिए राजनीति में घुसपैठ करने वाली एक पूरी जमात ने अपने जिस ज्ञान को अपना हथियार बनाकर लोकतंत्र को एक अदालती अखाड़ा समझ लिया है, उनके वितंडावादी अहंकार को काबू में करने के लिए भी इससे जुड़े कुछ राजनीतिक सबक ज़रूरी जान पड़ते हैं.

लगभग 200 वर्ष पूर्व ऑस्टिन ने कहा था कि ‘कानून संप्रभु का आदेश है’. बाद में लोग इस परिभाषा से आगे भी बढ़े. लेकिन संप्रभुता की अवधारणा न केवल एक राष्ट्र-राज्य का दूसरे राष्ट्र-राज्य के साथ संबंधों में, बल्कि एक राज्य के भीतर भी जनता और राज्य-सत्ता के संदर्भ में भी एक विशेष अर्थ लिए रहा है. रज्य-सत्ता और जनता के बीच संप्रभुता को केवल मात्र एकतरफा बंधनकारिता या ऑबलिगेशन के संदर्भ में ही दुरूपयोग किए जाने के चलते इसका सरलार्थीकरण और विस्तारीकरण आवश्यक हो गया है.

लोकतंत्र में संप्रभु कौन है, इसका सैद्धांतिक और मूर्त्तमान स्वरूप क्या है, और किसी भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया में व्यवहारतः इसे घटित होते हुए कैसे समझा जाय, इन तमाम प्रश्नों को जब तक इनके राजनीतिक अर्थ में निरूपित नहीं किया जाता, तब तक इसके कानूनी अर्थ के डंडे से ही हम हाँके जाते रहेंगे.

संसदीय लोकतंत्र में संविधान, जनता और संसद, इन तीनों में कौन संप्रभु है, यह समस्या प्रथम दृष्ट्या ‘मुर्गी पहले या अंडा’ जैसी स्थिति जान पड़ती है. सैद्धांतिक तौर पर लोकतंत्र में जनता सर्वोच्च है. अस्थायी और परिवर्तनीय शासन को कायम करने के लिए सशर्त्त और तात्कालिक बहुमत एक व्यवस्था मात्र है, और इसलिए अल्पमत के हितों और विचारों का सम्मान करना भी इससे अपेक्षित है. संविधान भी जनता द्वारा चुने गए नुमाइंदों ने बनाया जिसे जनता ने स्वयं को ही आत्मर्पित किया. संसद जैसी संस्था जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के लिए बनाया गई वह संवैधानिक व्यवस्था है, जो अपने ‘प्रत्येक कार्य’ के लिए जनता के प्रति ‘हर क्षण’ उत्तरदायी है. संप्रभुत्त्वसंपन्न जनता के आदेश पर या उसकी सहमति से संसद संविधान में संशोधन भी कर सकती है, और इसका प्रावधान जनता ने अपने नुमाइंदों के माध्यम से स्वयं संविधान में किया हुआ है.

कानून संवैधानिक उपबंधों के दायरे में रहकर बनाए गए ऐसे सकारात्मक, निषेधात्मक और दंडात्मक प्रावधान या विनियम हैं, जिन्हें जनता ने एक सुचारू व्यवस्था के संचालन के लिए अपनी गतिशील मांगों और ज़रूरतों के आधार पर, अपने सक्रिय सहयोग और भागीदारी से अपने प्रतिनिधियों द्वारा बनवा कर इसे मान्यता प्रदान किया है, और सब पर समान रूप से आरोपित किया है.

इस प्रकार संसद, कानून और जनता, इन तीनों में जो कॉमन या सर्वनिष्ठ है, वह है जनता. बाह्य रूप से एक संप्रभुत्त्व संपन्न राज्य की संप्रभुता का वास्तविक श्रोत जनता की भौगोलिक चेतना से युक्त एक एकीकृत इच्छा ही है. राज्य के भीतर राजनीतिक रूप से बाँकी सारी व्यवस्थाएँ अस्थायी, तात्कालिक, परिवर्तनीय और गतिशील हैं. केवल उन मौलिक मानवीय और लोकतांत्रिक अधिकारों को छोड़कर जिनकी सार्वभौमिकता को स्वीकारते हुए उसे स्वयं जनता ने ही अपरिवर्तनीय या असंशोधनीय बनाया हुआ है. संप्रभु जनता की इस लोकतांत्रिक संकल्पना को समझने और आत्मसात करने के लिए हमारे कुछ कानूनविद् राजनेताओं और मंत्रियों को अपने कुछ अंधकानूनी आग्रहों को दिमाग से निकालने की ज़रूरत होगी, और यह समय की मांग और बढ़ रही जन-जागरुकता के हिसाब से उनके लिए एक बाध्यता है, न कि उनकी उदारता या सनक का मोहताज एक विचार मात्र.

एक प्रचंड कानून के लिए अन्ना हज़ारे के नेतृत्व में अधीरता का परिचय देते हुए जिस गुस्से के साथ लोग सड़क पर आ रहे हैं, उसके तात्कालिक चरित्र को समझने की चौकसी के साथ ही उसके पीछे जाने की ज़रूरत कहीं ज़्यादा जान पड़ती है.

वर्तमान जन-लोकपाल बिल के संदर्भ में जो लोग आज ‘संसद का परमाधिकार’ और ‘कानून निर्माण की संस्थागत प्रक्रियाएँ’ हमें समझाने पर तुले हुए हैं, उनके लिए यह आत्ममनन की घड़ी होनी चाहिए, न कि दूसरों के चरित्रहनन की. क्योंकि वास्तव में जनता की यह तात्कालिक अधीरता, कानून निर्माण में व्यावहारिक रूप से, और सदिच्छा से लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को अपनाने में उनके विफल रहने की तार्किक परिणति ही है.

इस देश में ऐसा कितनी बार हुआ है कि किसी कानून को लाने या हटाने को लेकर कोई देशव्यापी आंदोलन हुआ हो. ऐसा कितनी बार हुआ है कि कानूनों को लाने, बदलने या हटाने के मुद्दे पर चुनाव लड़े गए हों. और यदि ऐसा हुआ भी तो सरकारों ने इसका पालन किया हो. क्या इस देश में कोई ऐसा व्यापक अध्ययन भी हुआ है कि कौन सा कानून कैसा कार्य कर रहा है, उसकी उपयोगिता और दुरुपयोगिता का स्तर क्या है. लॉ कमीशन जैसी संस्था इस मामले में कितनी प्रभावी साबित हुई है?

सच तो यह है कि कानूनों को पवित्र गाय की तरह देखा जाने लगा है. उन्हें अपने आप में साध्य मान लिया गया है. कानूनी प्रक्रियाओं और प्रचलित कानूनों के सभी स्तरों पर जो व्यापक दुरुपयोग न्यायिक बिरादरी, राजनीतिज्ञों और धनपशुओं द्वारा किया जा रहा है, उस पर एक आम समझ के साथ चर्चा तो की जाती है लेकिन उसमें बदलाव के लिए कोई ठोस बहस और लामबंदी दिखाई नहीं देती.

कानूनों का निर्माण और इसके पालन में हर स्तर पर जनता के माध्यम से चेक एंड बैलेंस की व्यवस्था के बारे में चर्चा नहीं की जा रही है. कानूनी भाषा और प्रक्रिया की क्लिष्टता को लेकर एक सहमति और जागरुकता तो नज़र आती है, लेकिन इसमें परिवर्तन को लेकर कोई सार्थक हस्तक्षेप वर्तमान में दूर-दूर तक दिखाई नहीं देता. कानून को हम एक इंडिपेंडेट अथवा स्वायत्त व्यवस्था के रूप में देखने लगे हैं जिसके बारे में माना जाने लगा है कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया से अलग है, और इसे ऐसा ही होना चाहिए. ‘कानून का शासन’ को ‘कानून के द्वारा शासन’ के रूप में प्रचारित और स्थापित किया जा रहा है.

सैद्धांतिक तौर पर एक बहुलतावादी संसदीय राजनीति में राजनीतिक दलों से अपेक्षा की जाती है है कि वह राजनीतिक समाजीकरण को गंभीरता से लेते हुए हित-सामूहीकरण और हित-अभिव्यक्तिकरण का सशक्त माध्यम बनेंगे. लेकिन भारतीय राजनीतिक संस्कृति में जिस प्रकार के दलों का उभार हुआ है उनमें सभी प्रकार की सकारात्मक विविधताओं के बावज़ूद जो नकारात्मक समरूपता रही है, वह है नेतृत्व के स्तर पर व्यक्तिपरकता और चुनावेत्तर अवधि में जनता से पूरी तरह से बिलगाव. इन दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र या किसी पारदर्शी प्रक्रिया के अभाव के चलते किसी अर्थपूर्ण विधायन की संभावना और भी क्षीण हुई है. चूँकि पार्टियाँ ही विधायन को गंभीरता से नहीं ले रही हैं, इसलिए इनके उम्मीदवारों पर कोई दबाव नहीं होता कि वे इसे गंभीरता से लें.

संसदीय कार्यवाही के दौरान जब बहस-चर्चा और सवाल-जवाब होते भी हैं तो उसकी वैधता और अर्थपूर्णता इसलिए संदेहास्पद होती है कि उन मुद्दों पर इन प्रतिनिधियों ने अपनी जनता से कोई मशविरा नहीं किया है. चुनाव इत्यादि के दौरान विधायन संबंधी मुद्दे या मौज़ूदा कानूनों की स्थिति पर कभी चर्चा नहीं हो पाती. न तो किसी राजनीतिक दल के घोषणापत्र में इस पर विस्तार और स्पष्ट रूप से कुछ कहा जाता है, और न ही कभी इसपर जनता के साथ किसी प्रकार का द्विपक्षीय संचार या विचारों का आदान-प्रदान होता है.

जन प्रतिनिधियों को संसद में प्रस्तुत बिल पर सोचने-समझने और चर्चा करने का पर्याप्त समय और अवसर नहीं मिल पाता है. वैसे भी उन पर राजनीतिक दलों का स्टैंड ही हावी होता है. ऐसा भी देखा गया है कि महत्त्वपूर्ण मसलों पर भी इक्के-दुक्के दलों को छोड़कर राजनीतिक दलों का कोई स्पष्ट विचार नहीं होता. इस मामले में वे भेड़ियाधसान प्रवृत्ति के होते हैं, और सत्ता गठबंधन में होने या न होने की स्थिति के मुताबिक अपनी राय बनाते और बदलते रहते हैं.

प्रस्तुत बिल को जन प्रतिनिधि अपने स्थानीय संदर्भों से जोड़कर व्याख्यायित करने का प्रयास नहीं करते. इसके लिए वे अपनी पार्टी के भीतर या अपने क्षेत्र के लोगों के साथ भी विचार-विमर्श करते नहीं पाए जाते. स्टैडिंग कमिटी या सरकारी कंसल्टेशन की प्रक्रिया खानापूर्ति बनती जा रही है. कानूनों की पेंचीदगियों में प्रतिनिधियों और जनसामान्य की दिलचस्पी का अभाव का एक प्रमुख कारण कानून की भाषा का दुरूह होना भी है. इससे यह कानूनविदों और नौकरशाहों के हाथ का खिलौना बन जाता है.

मीडिया भी इसके लिए दूसरे विशेषज्ञों के विश्लेषण पर ही भरोसा करता है. जनप्रतिनिधि भी मीडिया और विशेषज्ञों तथा पॉलिसी संस्थाओं के विश्लेषण पर ही आश्रित होने लगे हैं. ऐसे विश्लेषणों में निहित स्वार्थों का घालमेल किस प्रकार किया जा सकता है, वह राडियाटेप कांड के बाद लोगों के सामने आ चुका है.

इस तरह जनता और कथित प्रतिनिधियों के बीच विधायन संबंधी मुद्दों पर जो एक खाई या गैप मौज़ूद है, उसे भरने के लिए पॉलिसी एक्सपर्ट्स के स्तर पर कुछ समूह सक्रिय हुए हैं. लेकिन इनकी सक्रियता भी इस रूप में संदेहास्पद है कि इसमें भी सूक्ष्म रूप से किसी भी एजेंडे को सदस्यों के माध्यम से ठेलने की कवायद की जा सकती है. इनके द्वारा सुझाए गए आयातित बेस्ट प्रैक्टिसेज़ की वैधता और उपादेयता भी संदेहास्पद हो सकती है. इनकी भाषा तकनीकी और सैद्धांतिक स्तर पर इतनी दुरूह होती है कि जन सामान्य के साथ इनका संचार कभी संभव ही नहीं है, और इससे योजनाकर्ता विशेषज्ञों और जनसामान्य के बीच एक प्रकार के शक्ति-संबंध को भी बल मिलता है. इससे नीति निर्माण और योजना के टॉप-डाउन उपागम को भी स्थापित होने का मौका मिलता है.

एडवोकेसी अथवा पैरोकारी या नीति संबधी शोध और विश्लेषण मुहैया कराने का उपक्रम लोकतंत्र को गहरा करने या जमीन से जोड़ने की बजाए उसे बीच में ही लपक कर हथिया लेने जैसा प्रयास है. इससे प्रतिनिधियों को भी बैठे-ठाले बोधगम्य और पका-पकाया परिप्रेक्ष्य मिल जाता है जिसे संदिग्ध नजरिए से देखने की बजाए वे उसे अपने निर्णय-निर्माण का आधार पाठ और सबूत तक मान लेते हैं. जबकि प्रतिनिधित्व का सिद्धांत उन्हें जमीन पर जाकर जनता से संवाद के माध्यम से उनका फीडबैक और उनके इनपुट को विधायन में पिरोने की प्रक्रिया को मजबूत करने की उम्मीद पालता है.

आज आम जनता से लेकर सरकार तक, अन्याय के हर मामले को और न्याय की हर गुहार को अदालत के पाले में डाल रही है. दूसरी तरफ अदालतें इन्हीं जन-प्रतिनिधियों द्वारा बनाए गए ‘कानूनों’ के आधार पर कार्य करती हैं. कुल मिलाकर कर इस व्यवस्था में सब कुछ कानून की दुहाई देकर की जाती है और हम एक कानूनतंत्र में विश्वास करने लगे हैं.

तार्किक रूप से देखा जाए तो, इसका मतलब है कि लोकतंत्र और कानूनतंत्र साथ-साथ मौज़ूद हैं, या हो सकते हैं. तो अब जब हमने लोकतंत्र का कानूनीकरण कर रखा है, तो क्या दोनों को एक साथ चलने के लिए कानून के लोकतांत्रीकरण की आवश्यकता नहीं है? यदि लोकतांत्रिक अधिकारों के इस्तेमाल के लिए भी कानून की शरण में जाना पड़ता है, तो क्या कानून आम जनता के लिए सर्वसुलभ और बोधगम्य नहीं होना चाहिए?

कानून के माध्यम से लोकतंत्र का लाभ उठाने के लिए क्या वर्त्तमान में कानूनों की भाषा ऐसी है कि इस देश की आम जनता उसे सीधी-सरल भाषा में समझ सके? इसमें सुधार लाने के लिए अपनी राय दे सके या चुनाव के दौरान ऐसी मांगें रख सके? क्या यह एक सच्चाई नहीं है कि कानूनों की जटिलता के कारण इस तक पहुँच के लिए कानूनविदों जैसे बिचौलियों की ज़रूरत होने की वज़ह से आम जनता का एक बड़ा तबका पहले ही इस परिधि से बाहर हो गया है? कानून के माध्यम से ही नागरिक अधिकार सुनिश्चित होने की वज़ह से आम नागरिक अधिकार भी क्या ‘विशेषाधिकार’ बनके नहीं रह गये हैं?

ऐसे में स्वाभाविक रूप से आज यह भावना गहरे रूप से घर करने लगी है कि एक शासक वर्ग के रूप में हमारे कानून निर्माताओं की दिलचस्पी अप्रासंगिक कानूनों का महिमामंडन करने में ज्यादा है. बिना इस बात को सामने लाते हुए कि कानून अपने-आप में कोई स्वायत्त व्यवस्था नहीं है. वह भी राजनीति का हिस्सा है और होना चाहिए. विडंबना यह है कि कानून निर्माण और कार्यान्वयन में प्रत्येक स्तर पर जन-भागीदारी और चौकसी सुनिश्चित करने और, कानूनों को जनोन्मुखी बनाने का कोई प्रभावी उपकरण हमारे पास इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में नहीं है, जबकि इसे अधिक से अधिक जन-विरोधी बनाने और बनाए रखने के सारे ‘संवैधानिक’ और ‘कानूनी’ तरीके शासक-वर्ग को ‘विधिसम्मत’ और ‘संस्थागत’ रूप से उपलब्ध हैं.

 
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Posted by on September 4, 2011 in Uncategorized

 

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