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असहमति को स्वीकारने का साहस हमारे सत्ताधारियों में कहां है

17 Aug

असहमति को स्वीकारने की विधि हमारे सत्ताधारियों को छः दशकों के हमारे लोकतंत्र ने सिखाई कहां है? इसलिए अन्ना हजारे के साथ ऐसा कुछ नहीं हुआ जो अनपेक्षित हो। यह न होता जो आश्चर्य जरूर होता। लोकतंत्र इस देश में सबसे बड़ा झूठ है,जिसकी आड़ में हमारे सारे गलत काम चल रहे हैं। संसद और विधानसभाएं अगर बेमानी दिखने लगी हैं तो इसमें बैठने वाले इस जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। साढ़े छः दशक का लोकतंत्र भोग लेने के बाद लालकिले से प्रधानमंत्री उसी गरीबी और बेकारी को कोस रहे हैं। यह गरीबी, बेकारी, भुखमरी और तंगहाली अगर साढ़े छः दशक की यात्रा में खत्म नहीं हुयी तो क्या गारंटी है कि आने वाले छः दशकों में भी यह खत्म हो जाएगी। अमीर और गरीब की खाई इन बीस सालों में जितनी बढ़ी है उतनी पहले कभी नहीं थी। अन्ना एक शांतिपूर्ण अहसमहमति का नाम हैं, इसलिए वे जेल में हैं। नक्सलियों, आतंकवादियों और अपराधी जमातों के प्रति कार्रवाई करते हमारे हाथ क्यों कांप रहे हैं?अफजल और गुरू और कसाब से न निपट पाने वाली सरकारें अपने लोगों के प्रति कितनी निर्मम व असहिष्णु हो जाती हैं यह हम सबने देखा है। रामदेव और अन्ना के बहाने दिल्ली अपनी बेदिली की कहानी ही कहती है।

बदजबानी और दंभ के ऐसे किस्से अन्ना के बहाने हमारे सामने खुलकर आए हैं जो लोकतंत्र को अधिनायकतंत्र में बदलने का प्रमाण देते हैं। कपिल सिब्बल और मनीष तिवारी जैसै दरबारियों की दहाड़ और हिम्मत देखिए कि वे अन्ना और ए. राजा का अंतर भूल जाते हैं। ऐसे कठिन समय में अन्ना हजारे हमें हमारे समय के सच का भान भी कराते हैं। वे न होते तो लोकतंत्र की सच्चाईयां इस तरह सामने न आतीं। एक सत्ता किस तरह मनमोहन सिंह जैसे व्यक्ति को एक रोबोट में रूपांतरित कर देती है, यह इसका भी उदाहरण है। वे लालकिले से क्या बोले, क्यों बोले ऐसे तमाम सवाल हमारे सामने हैं। आखिर क्या खाकर आप अन्ना की नीयत पर शक कर रहे हैं। आरएसएस और न जाने किससे-किससे उनकी नातेदारियां जोड़ी जा रही हैं। पर सच यह है कि पूरे राजनीतिक तंत्र में इतनी घबराहट पहले कभी नहीं देखी गयी। विपक्षी दल भी यहां कौरव दल ही साबित हो रहे हैं। वे मौके पर चौका लगाना चाहते हैं किंतु अन्ना के उठाए जा रहे सवालों पर उनकी भी नीयत साफ नहीं है। वरना क्या कारण था कि सर्वदलीय बैठक में अन्ना की टीम से संवाद करने पर ही सवाल उठाए गए। यह सही मायने में दुखी करने वाले प्रसंग हैं। राजनीति का इतना असहाय और बेचारा हो जाना बताता है कि हमारा लोकतंत्र कितना बेमानी हो चुका है। किस तरह उसकी चूलें हिल रही हैं। किस तरह वह हमारे लिए बोझ बन रहा है। भारत के शहीदों की शहादत को इस तरह व्यर्थ होता देखना क्या हमारी नीयत बन गयी है। सवाल लोकपाल का नहीं उससे भी बड़ा है। सवाल प्रजातांत्रिक मूल्यों का है। सवाल इसका भी है कि असहमति के लिए हमारे लोकतंत्रांत्रिक ढांचें में स्पेस कम क्यों हो रहा है।

सवाल यह भी है कि कश्मीर के गिलानी से लेकर माओवादियों का खुला समर्थन करने वाली अरूंधती राय तक दिल्ली में भारत की सरकार को गालियां देकर, भारत को भूखे-नंगों का देश कह कर चले जाएं किंतु दिल्ली की बहादुर पुलिस खामोश रहती है। उसी दिल्ली की सरकार में अफजल गुरू के मृत्युदंड से संबंधित फाइल 19 रिमांडर के बाद भी धूमती रहती है। किंतु बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के लिए कितनी त्वरा और कितनी गति है। यह गति काश आतंकियों, उनके पोषकों, माओवादियों के लिए होती तो देश रोजाना खून से न नहाता। किंतु हमारा गृहमंत्रालय भगवा आतंकवाद, बाबा रामदेव और अन्ना हजारे की कुंडलियां तलाशने में लगा है। मंदिर में सोने वाले एक गांधीवादी के पीछे लगे हाथ खोजे जा रहे हैं। आंदोलन को बदनाम करने के लिए अन्ना हजारे को भी अपनी भ्रष्ट मंडली का सदस्य बताने की कोशिश हो रही है। आखिर इससे हासिल क्या है। क्या अन्ना का आभा इससे कम हुयी है या कांग्रेस के दंभ से भरे नेता बेनकाब हो रहे हैं। सत्ता कुछ भी कर सकती है, इसमें दो राय नहीं किंतु वह कब तक कर सकती है-एक लोकतंत्र में इसकी भी सीमाएं हैं। चाहे अनचाहे कांग्रेस ने खुद को भ्रष्टाचार समर्थक के रूप में स्थापित कर लिया है। अन्य दल दूध के धुले हैं ऐसा नहीं हैं किंतु केंद्र की सत्ता में होने के कारण और इस दौर में अर्जित अपने दंभ के कारण कांग्रेस ने अपनी छवि मलिन ही की है। कांग्रेस का यह दंभ आखिर उसे किस मार्ग पर लेकर जाएगा कहना कठिन हैं किंतु देश के भीतर कांग्रेस के इस व्यवहार से एक तरह का अवसाद और निराशा घर कर गयी है। इसके चलते कांग्रेस के युवराज की एक आम आदमी के पक्ष के कांग्रेस का साफ-सुथरा चेहरा बनाने की कोशिशें भी प्रभावित हुयी हैं। आप लोंगों पर गोलियां चलाते हुए (पूणे), लाठियां भांजते हुए (रामदेव की सभा) और लोगों को जेलों में ठूंसते हुए (अन्ना प्रसंग) कितने भी लोकतंत्रवादी और आम आदमी के समर्थक होने का दम भरें, भरोसा तो टूटता ही है। अफसोस यह है कि आम आदमी की बात करने वाले विपक्षी दलों के नेताओं की भूमिका भी इस मामले में पूरी तरह संदिग्ध है। अवसर का लाभ लेने में लगे विपक्षी दल अगर सही मायने में बदलाव चाहते हैं तो उन्हें अन्ना के साथ लामबंद होना ही होगा। पूरी दुनिया में पारदर्शिता के लिए संघर्ष चल रहे हैं, भारत के लोगों को भी अब एक सार्थक बदलाव के लिए, लंबी लड़ाई के लिए तैयार हो जाना चाहिए।

 
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Posted by on August 17, 2011 in Uncategorized

 

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