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मत गांधी को बदनाम करो

11 Jul

पानी, भात, रोटी, आलू, शक्कर, नमक और गांधी हर मुसीबतज़दा भारतीय के जीवन के सात सुर हैं. ये सब सस्ते ही हैं बनिस्बत बाकी चीज़ों और व्यक्तियों के. इन पर सभी मनुष्यों का एकाधिकार है. ये जीवन रक्षक तो हैं लेकिन धीरे धीरे केवल इस्तेमाल की वस्तु प्रचारित हो गए हैं. ये आसानी से सड़ते या खराब नहीं होते. कहीं भी मिल जाते हैं और देह में रचते, पचते, बसते जाते हैं. ये कंट्रोल की वस्तु नहीं बन पाते भले ही सरकार कभी कभी कोशिश करती रहे.

रामदेव और अन्ना हजारे प्रसंग में गांधी का धड़ल्ले से इस्तेमाल हो रहा है. अन्ना के सात्विक अनशन के वक्त देश को गांधी की याद आई. कुछ ने अन्ना में गांधी ढूंढ़ना शुरू भी कर दिया. अन्ना हजारे भले मानुष हैं. उन्होंने ऐसी चाटुकारिता को खारिज करते हुए सत्य कहा कि वे तो गांधी के पैर की धूल के बराबर भी नहीं हैं. इसके बरक्स बाबा रामदेव बहुत चतुराई के साथ अपने अनशन आंदोलन को गांधीवादी नस्ल का करार दे रहे हैं. वे बात बात में गांधी जी की याद करने लगते हैं जिससे लोग रामदेव के मार्फत गांधी को नहीं भूले. ऐसा करने से गांधी का नुकसान और रामदेव का फायदा तो होता है.

फिलवक्त रामदेव कैमरे के सामने बार बार एकालाप कर रहे हैं कि गांधी होते तो दिल्ली पुलिस की बर्बरता देखकर रोने लगते. इतिहास में गांधी कभी नहीं रोए. अलबत्ता वे लोगों की आंखों से बहने वाले आंसू पोछते रहे. गांधी आत्म क्रूर व्यक्ति थे. उन्होंने अपनी भावनाओं पर मनसा वाचा कर्मणा नियंत्रण कर लिया था. साबरमती आश्रम के एक कुष्ठ रोगी का मलमूत्र साफ करने से इंकार करने पर गांधी ने अपनी उस बड़ी बहन को आश्रम निकाला दे दिया जिसे मातृविहीन गांधी अपनी माता कहते थे. अपनी पत्नी कस्तूरबा के साथ उन्होंने ऐसा ही सलूक किया था. करोड़ों की दवाइयां बेचने वाले स्वामी रामदेव के आश्रम या योगपीठ में कितने कुष्ठ रोगियों की मुफ्त सेवा हो रही है?

अद्भुत सांस्कृतिक विचारक राममनोहर लोहिया ने लिखा है कि त्रेता के राम रोऊ थे. पत्नी सीता के अपहरण के बाद वे जंगल में पशु पक्षियों और पेड़ पौधों से रो रोकर सीता का पता पूछते थे. इसके बरक्स द्वापर के कृष्ण कभी नहीं रोए. जब द्रौपदी का चीरहरण हो रहा था केवल तब कृष्ण की आंखें डबडबाई थीं. रामदेव ने तो खुद का चीरहरण किया और रोए भी. भट्टा पारसौल में जब मायावती की पुलिस स्त्रियों का चीरहरण कर रही थी तब रामदेव दूरदर्शन पर क्यों नहीं रोए? भट्टा पारसौल के निकट नोएडा में अनशन करने के लिए उन्होंने मायावती से क्या इसलिए अनुमति मांगी है कि वे टेलीविजन चैनलों के मुख्यालयों के नज़दीक होने के कारण हंस हंसकर अपनी प्रचार दुकान सजाएं?

गांधी ने महाभारत के अठारह अध्याय पढ़े थे, अठारह पुराण भी. वे शांति पर्व को महाभारत का निकष बताते हैं. वे तो यहां तक कहते हैं कि गीता युद्ध की निस्सारता का दस्तावेज है. इससे गांधी के समकालीन संघ परिवार के पूर्वज सावरकर सहमत नहीं थे. सहमत तो लोकमान्य तिलक भी नहीं थे.

आज जो लोग हिन्दुस्तान की राजनीति में धार्मिक नफरत, जातीय विद्वेष और आतंकवादी हिंसा घोलने के पंजीबद्ध अभियुक्त हैं, वे भी. रामदेव अपने मंच पर उनका सम्मान क्यों करते हैं. गांधी कभी भी चार्टर्ड हवाई जहाज या हेलिकॉप्टर से यात्रा नहीं करते थे. रामदेव द्वितीय श्रेणी के डिब्बे में यात्रा क्यों नहीं करते? अरबपति लोग और फिल्मी तारिकाएं उनके चेले चेलियां क्यों हैं? बाबा ने विदेशों में जमीन क्यों ले ली है. बाबा ढेरों कंपनियों के निर्माता क्यों हैं?

गांधी तो सादगी के पुजारी थे. यदि उन्हें आंदोलन करना भी होता तो वे अठारह करोड़ रुपया खर्च कर देश के इतिहास की सबसे बड़ी रामलीला आयोजित नहीं करते. पता नहीं रामानंद सागर के धारावाहिक रामायण पर कितना खर्च हुआ होगा? चंपारण का नील सत्याग्रह हो. दांडी का नमक मार्च हो या देश में की गई हरिजन यात्रा हो-गांधी ने वह सब तामझाम कहां दिखाया, रामलीला मैदान जिसका इतिहास में पूंजीवादी प्रस्थान बिंदु होगा.

गांधी के मुंह में तो क्या मन में भी अंगरेजों के लिए कोई नफरत नहीं थी. अंगरेजियत से उनको अलबत्त नफरत थी. बाबा को अपने आलोचकों, कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह वगैरह से नफरत क्यों है? गांधी ने तो कभी भी अंगरेज प्रधानमंत्री और भारतीय वाइसरॉय से बोलचाल की खुट्टी नहीं की. चर्चिल ने ही तो गांधी को ‘नंगा फकीर‘ कहा था. गांधी ने इतिहास में सिद्ध किया कि वे वास्तव में दिगंबर फकीर हैं. अंगरेज के पास शब्दों का टोटा था इसलिए उसने दिगंबर शब्द का उच्चारण नहीं किया. रामदेव भगवा फकीर क्यों नहीं कहलाना चाहते जिसके प्रवर्तक विवेकानन्द हैं?

कृषि, इंजीनियरिंग और डॉक्टरी वगैरह की पढ़ाई के लिए बाबा रामदेव भारत सरकार पर दबाव डाल रहे हैं कि वह हिन्दी और भारतीय भाषाओं में भी पढ़ाई जाए. गांधी गुजराती मां के बेटे थे. व्याकरण सम्मत हिन्दी तक बोलना उन्हें नहीं आता था. फिर भी उन्होंने हिन्दी विरोधी दक्षिण में राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सफल दफ्तर खोले.

रामदेव करीब दो सौ कंपनियों के निर्माता कहे जाते हैं. इनमें से कुछ कंपनियों के नाम पतंजलि, आयुर्वेद लिमिटेड, दिव्य फार्मेसी योग, आरोग्य हब्र्स, झारखंड मेगा फूड पार्क, दिव्य पैकमैफ, वैदिक अष्टभजन ब्राडकास्टिंग, डायनमिक बिल्डकॉम, पतंजलि बायो रिसर्च इंस्टीट्यूट हैं. हर संस्था में एक अंगरेजी शब्द घुसा हुआ है. क्या रामदेव इन संस्थाओं के नामों का हिन्दी अनुवाद पंजीकृत कराएंगे?

गांधी ट्रस्टीशिप जैसी आर्थिक अवधारणा के आविष्कारक थे. सबने उनकी खिल्ली उड़ाई. यहां तक कि उनके गुरु गोपाल कृष्ण गोखले और शिष्य जवाहरलाल नेहरू ने भी. मलयाली और बंगाली कम्युनिस्टों ने तो गांधी को प्रतिक्रियावादी तक कहा है. आज देश की सरकारी अर्थनीतियों में विस्थापितों को मुआवजा देने, निजी और सरकारी कारखानों में भागीदारी देने वगैरह में क्या गांधी का विचार दोहराया नहीं जा रहा है? बाबा रामदेव गांधी के नाम का तो उच्चारण करते हैं, काम का ब्यौरा देश को क्यों नहीं देते? क्या बाबा रामदेव देश को बताएंगे कि उनके कितने न्यासों में मुनाफे का कोई हिस्सा गरीब जनता के लिए सुरक्षित किया गया है?

गांधी पंथ निरपेक्ष थे और असांप्रदायिक. उन्हें तो एक कुंठित विचारधारा के प्रतिनिधि ने गोलियां मारीं. छाती पर गोलियां खाने के बाद भी गांधी ने ‘हे राम‘ ही कहा. वे कभी भी किसी मंच से कूदकर नहीं भागे. उन्होंने कभी भी अपनी जान बचाने के लिए पोशाक नहीं बदली. गोलमेज़ परिषद में गुलाम भारत की तरफ से लंदन भी गए तो बाकी सब भारतीयों ने कपड़े बदल लिए, लेकिन गांधी ने नहीं. जिनके पूर्वज गांधी के वैचारिक हत्यारे भी हैं उनके वंशज रामदेव को समर्थन देने के लिए यदि राजघाट पर सत्याग्रह करने का उपक्रम करते हैं तो इतिहास को भी अटपटा लगता है. भाजपा को देश को बताना चाहिए कि उसके अब तक के सर्वमान्य और अजातशत्रु नेता अटल बिहारी वाजपेयी की अध्यक्षता में ‘गांधीवादी समाजवाद‘ का जो वचन देश को दिया गया था उसका क्या हुआ?

गांधी अपने जीवन के अस्सी वर्ष पूरे नहीं कर सके. इसी आयु में अटल जी ने उत्कर्ष देखने के बाद भी पूरी तौर पर भारतीय परंपरा के अनुसार सन्यास ले लिया है. आडवाणी वाजपेयी से दो चार वर्ष छोटे हांेगे. अस्सी के पहले ही हो चुके हैं. प्रधानमंत्री बनने का सपना टूटने के साथ साथ उन्हें लगभग अपमानित करके पार्टी ने ही राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के कहने पर नेता पद से हटा दिया है. वे गांधी जी को गलत सलत संदर्भ में क्यों बखानते रहते हैं? रामदेव के आंदोलन में जबान में गांधी भी हैं और साध्वी ऋतंभरा भी. विचारों की ऐसी कॉकटेल से अहंकार का नशा तो हो सकता है लेकिन नशे के अहंकार को जीवन का सत्य नहीं कहा जाता.

कांग्रेस मनमोहन सिंह के नेतृत्व में अपने गौरवशाली इतिहास का केंचुल हो गई है. अर्थशास्त्र के विद्वान से प्रधानमंत्री के नेतृत्व में गांधी को लेकर भी अनर्थ हो रहे हैं. संघ परिवार के दतरों में तो गांधी, सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, राजगोपालाचारी, सुभाष बोस, मदनमोहन मालवीय, पुरुषोत्तम दास टंडन, सरोजिनी नायडू वगैरह की तस्वीरों को देखा जा सकता है. कांग्रेस में नए गांधी पुराने पर भारी पड़ रहे हैं. गांधी से मिलने सेवाग्राम की गोबर लिपी धरती पर भारत का वाइसरॉय आया था. मनमोहन सिंह के सिपेहसालार हवाई अड्डे और पांच सितारा होटल के वातानुकूलित कक्षों में बैठकर एक ऐसे भगवाधारी साधु का इस्तकबाल करते, जिस पर बाद में बर्बरतापूर्वक लाठी भांजते. केवल रामदेव पर नहीं बल्कि उससे ज़्यादा निहत्थी जनता अर्थात बच्चों और महिलाओं पर ज़्यादा.

कांग्रेस के हाथ से गांधी की लाठी छिन गई है और पुलिस की लाठी आ गई है. कांग्रेस सरकार ने गांधी की बकरी को छोड़ दिया है. वह तो जनता को ही भेड़ बकरी समझती है. बापू ने मद्य निषेध और खादी को कांग्रेस का मकसद बनाया था. अधिकांश कांग्रेसी नेता मद्य पान के नशे में रहते हैं और अपने चपरासियों के लिए खादी के वस्त्र सिलवाते हैं.

बापू ने झल्लाकर यह भी कहा था कि वे सत्य के लिए कभी अहिंसा को भी छोड़ सकते हैं. कांग्रेस सरकार ने कभी शब्द को तवारीख की स्लेट से मिटा दिया है. रामदेव में उतनी नैतिक ताकत भले नहीं हो लेकिन योग के कठिन परिश्रम, प्रदर्शन और प्रचार की रणनीति के चलते वे एक आइकॉन में तो परिवर्तित हो गए हैं. उनकी गिरतारी को लेकर कुछ सभ्यता तो बरती जा सकती थी.

मनमोहन सिंह ने कांग्रेस का इतिहास नहीं पढ़ा है. लेकिन अपने पूर्वज प्रधानमंत्रियों की बखिया उधेड़ने का इतिहास कांग्रेस पार्टी उनकी ही अगुआई में गढ़ा जा रहा है. गांधी ने पश्चिम की सभ्यता को शैतानियत की सभ्यता कहा था. वे शैतान भी गांधी से अधिकतर असहमत रहने के बावजूद तमीज़ से ही पेश आते थे.

(कनक तिवारी)

 
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Posted by on July 11, 2011 in Uncategorized

 

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