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अन्ना को चाहिए पूरे समाज का समर्थन

12 Apr

दिल्ली में जिस सात जंतर मंतर के दरवाजे पर अन्ना हजारे आमरण अनशन स्थल पर बैठे हैं, वह कांग्रेस का मुख्यालय था. भ्रष्टाचार को जंतर मंतर की तरह भारतीय जनमानस में कई रूपों में अनुभव किया जाता रहा है.

अन्ना के आमरण स्थल पर पच्चासी पैसे ढूंढो आंदोलन का एक कार्यकर्ता भी तख्ती लगाए घुम रहा था. भ्रष्टाचार के एक नये नाम के रूप में पच्चासी पैसा तब से मशहूर हुआ, जब राजीव गांधी ने सार्वजनिक तौर पर यह स्वीकार किया कि केन्द्र सरकार से गांव और लोगों के हितों के लिए जो पैसा जाता है, उसका पच्चासी पैसा बीच का तंत्र ही हड़प जाता है.

इंदिरा गांधी के 1980 में दोबारा प्रधानमंत्री बनने के बाद महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ए आर अंतुले को लगभग तीस करोड़ का नाजायज लाभ पहुंचाने के आरोप में गद्दी छोड़नी पड़ी थी. विश्वनाथ प्रताप सिंह ने राजीव गांधी की सरकार पर बोफर्से तोप के सौदे में उसके दोगुने करोड़ रूपये की दलाली का आरोप लगाया था. उन्होंने इस भ्रष्टाचार को जनमानस तक इस रूप में पहुंचाया था कि यदि इतने रूपये बचा लिये जाते तो देश के गांवों में सैकड़ों स्कूल खुल जाते.

पूरे देश में घुम-घुमकर वह खाता नंबर भी बताया था, जिसमें दलाली का पैसा जमा होने का दावा किया गया. वकील राम जेठमलानी ने उस समय रोज-रोज राजीव सरकार से दस सवाल पूछे. लेकिन बोफर्स मामले का कोई नतीजा नहीं निकला और राम जेठमलानी ने भी उन सवालों के लिए सार्वजनिक माफी मांग ली.

विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के बाद कई बार देश में भ्रष्टाचार विरोधी मुहिम शुरू करने की कोशिश की गई. मुंबई नगर निगम के अधिकारी खैरनार पूरे देश में घुमकर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन खड़ा करने की कोशिश करते रहे. लेकिन भ्रष्टाचार का स्तर बढ़ता चला गया. केन्द्र सरकार के सूचना प्रौधोगिकी मंत्रालय द्वारा स्पेक्ट्रम 2 जी के संचार माध्यमों की कंपनियों को आवंटित करने में 1 करोड़ पचहतर लाख करोड़ रूपये का घोटाला किया गया. इसके साथ आदर्श हाउसिंग सोसायटी, राष्ट्रमंडल खेल और दूसरे कई घोटालों का जोड़ प्रस्तुत किया जाए तो 1991-2011 के बीच एक लाख गुना भ्रष्टाचार का स्तर बढ़ने के आंकड़े सामने आ सकते हैं.

भ्रष्टाचार के विरोध में लड़ाई के कई पक्ष सामने आ चुके हैं. काले घन पर रोक के लिए कानून बने हुए हैं. स्वीस बैंक में जमा पैसे का एक मोटा हिसाब देश को बताया गया है कि यदि वे पैसे देश में आ जाएं तो देश का कल्याण हो सकता है.

हमारे समाज में कई तरह की विचारधाराएं सक्रिय हैं. उनके लड़ने और समाज को बनाने के अपने तरीके होते हैं. कहावत है कि डुबते को तिनके का सहारा. भ्रष्टाचार से पूरा समाज इतना त्रस्त है कि उससे निजात पाने के लिए जो रास्ता सबसे आकर्षक नजर आता है, उसके समर्थन में निकल पड़ने का मन करता है. लेकिन वास्तव में इस प्रश्न पर विचार किया जा सकता है कि भ्रष्टाचार क्या किसी जड़ का नाम है ? तालाबों में जो हरी गंदगी दिखाई देती है, उस तरह का है जो एक बार सफाई के बाद फिर से उग आती है ? तालाब में वह हरी गंदी इसी तरह रोपी गई है कि देश भर के तालाब गंदे हो गए हैं.

संसदीय लोकतंत्र का आधार चुनाव है और चुनाव में भ्रष्टाचार अंग्रेजों के समय होने वाले चुनाव के समय से ही देखे जा रहे है. अब चुनाव में करोड़ों रूपये नगद पकड़े जा रहे हैं. जब-जब चुनावी भ्रष्टाचार बढ़ता है तो सरकार द्वारा फंडिंग की बात की जाने लगती है.

यदि सुधार की प्रक्रिया पर बात की जाए तो भ्रष्टाचार विरोधी तरह-तरह के उपाय नाकाफी साबित हो रहे हैं. तब क्या सुधार की प्रक्रिया पर बातचीत बंद कर देनी चाहिए और व्यवस्था में भ्रष्टाचार के फलने फूलने के जो आधार है, उन पर चोट करनी चाहिए या वहां सुधार करने की जरूरत है ? यह एक प्रश्न सबके सामने खड़ा होता है.

इसका अर्थ यह भी निकाला जा सकता है कि भ्रष्टाचार अकेले एक मुद्दे के रूप में परिवर्तन का कोई प्रारूप पेश नहीं करता हैं. भ्रष्टाचार को मूल सवालों के केन्द्र में जरूर रखा जा सकता है. मूल सवालों के अन्ना हजारे के नेतृत्व वाले भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को केन्द्र में रखने की कोशिश राजनीतिक शक्तियां कर सकती है. लेकिन वो राजनीतिक पार्टियां नहीं, जो अविश्वसनीय हो गई है और अन्ना के आमरण अनशन स्थल से राजनीतिक नेताओं के खदेड़े जाने के रूप में जो दिखाई दी.

निश्चित तौर पर अन्ना के जज्बे को सलाम किया जाना चाहिए. लेकिन ये कहना कि मनमोहन सिंह यदि आपको वोट चाहिए तो जन लोकपाल बिल लाएं, अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के विस्तार की संभावानाओं को रोकता है. महज जन लोकपाल बिल भ्रष्टाचार के खात्मे की गारंटी नहीं हो सकता है. वह भ्रष्टाचार विरोधी एक प्रक्रिया का ढांचा हो सकता है. लेकिन आंदोलन जड़ो पर प्रहार करता है और तेजी के साथ समाज को नोंच खाने के नाखून मनमोहन सिंह की सरकार की नीतियों के लागू होने के बाद तैयार हुए हैं.

जन लोकपाल बिल आम भ्रष्टाचार की संस्कृति के खिलाफ एक मुकम्मल ढांचा नहीं हो सकता है. वह ढांचा समाज की चेतना में सुरक्षित रहता है. आंदोलन का जोर उसी ढांचे को तैयार करने पर होता है. दरअसल अन्ना को पूरे देश का समर्थन मिल रहा है तो उसका प्रतिनिधित्व दिखाई देना चाहिए. यह हर किसी आंदोलन को सचेत रूप से करना पड़ता है. जो गांधी ने उस दौर में जागरूकता के स्तर के अनुसार उसका ध्यान रखा लेकिन गांधीवादिता वहीं ठहर नहीं जाती है. जो प्रतीक चिन्ह आंदोलन के विस्तार को बाधित करते हैं, उनके प्रति सतर्क होना पड़ता है.

समाज में जागरूकता के सूक्ष्म रूप विकसित हुए है. वह प्रतीकों, आदर्शों, चिन्हों में भी होता है. आमरण अनशन पर एक युवती कह रही थी कि केवल युवाओं का नाम लिया जा रहा है, युवतियां संबोधित नहीं हो रही है. यह हिन्दुत्व की रक्षा के लिए आर्यसमाजी आंदोलन भी नहीं हो सकता. भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का सिविल सोसायटी की ताकत तक सिमटना भ्रष्टाचार के आंदोलन की एक सीमा तय कर देता है.

देश में सिविल सोसायटी का अर्थ तो यही होता है कि वह आम लोगों के अपेक्षाकृत संपन्न और ताकतवर हैं. विश्वविद्यालयों की डिग्रियों के बूते विभिन्न तरह के पेशे में सक्रिय हैं. शहरों के सिविल लाइंस वैसे ही लोगों के उभार के साथ बने हैं. अन्ना के आंदोलन का विस्तार शहर भर के लोगों के समर्थन पर निर्भर करता है. योग व्यापारी रामदेव के पोस्टर अन्ना के आमरण अनशन स्थल से दूसरे दिन उतर गए तो उसका कोई फर्क नहीं पड़ा. किरन बेदी दिखनी बंद हो गई तो भी असर नहीं दिखा.

दरअसल भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के लिए एक अन्ना ही काफी है. दूसरे जो लोग आंदोलन में सक्रिय हैं, वे ही 73 वर्षीय अन्ना की ताकत हैं. राजनीतिक पार्टियां चाहती हैं कि अन्ना के आंदोलन के इर्द-गिर्द अपनी बढ़ती अवैधता को कम करने की कोशिश करें. सरकारी पार्टी आंदोलन की वैधता पर कई तरह के सवाल खड़े कर रही हैं. तकनीकी खामियां ढूंढने के लिए वकीलों की फौज लगा रखी है. उसकी नजर में तो उसकी तरफ अंगुली उठाने वाला और हर वक्त अंगुली उठाने की तस्वीर तैयार करने वाला स्वभाविक तौर पर आरोपी है.

अन्ना के बारे में एक बात मशहूर है कि वे टूट सकते हैं लेकिन झुक नहीं सकते. अन्ना का आंदोलन देश भर में भ्रष्टाचार के विरोध में एक सांस्कृतिक और राजनीतिक माहौल विकसित कर रहा है.

 
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Posted by on April 12, 2011 in Uncategorized

 

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