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थैंक यू, सुप्रीम कोर्ट

07 Mar

इधर कुछ महीनों से सुप्रीम कोर्ट ने देश की चिंता करने में ज़्यादा सक्रियता बरतने का परिचय दिया है. वैसे वे सब काम कार्यपालिका अर्थात केन्द्र सरकार को ही करने थे. देश की यह हालत है कि मुद्दई सुस्त गवाह चुस्त की तरह आचरण हो रहा है.

न्यायिक सक्रियता का लेकिन बढ़ जाना लोकतंत्र के लिए अच्छा लक्षण नहीं है. इससे धीरे-धीरे न्यायपालिका में भी एक तरह का अधिनायकवाद उभरता रहा है. लेकिन मौज़ूदा हालत यह है कि यदि न्यायतन्त्र ने तन्त्र के अन्याय के खिलाफ लोकतांत्रिक मूल्यों का बचाव नहीं किया तो जनता में भयानक पराजय की भावना पनपने लगेगी. मौजूदा समय में वही एक पुराना कारण राजनेताओं और नौकरशाहों को जुल्मखोर बनाता नज़र आ रहा है क्योंकि भारतीय जनता में इक्कीसवीं सदी में भी अन्याय के खिलाफ उठ खड़े होने का मुनासिब जज्बा दीख ही नहीं रहा है.

केन्द्रीय सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री के प्रशासनिक-न्यायिक विवेक पर सीधा तमाचा मारा है. शुरू में यह भ्रम फैलाया गया कि तीन सदस्यीय चयन समिति के सामने थॉमस की वह पुरानी फाइल रखी ही नहीं गई जब उनके खिलाफ केरल राज्य के सचिव के रूप में पामोलिन घोटाले में उनका भी नाम अभियुक्तों में संलग्न किया गया था.

बाद में खुद गृहमंत्री चिदंबरम ने यह सार्वजनिक तौर पर स्वीकार किया कि कम से कम चयन समिति की तीसरी सदस्य लोकसभा में प्रतिपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने इस मामले में आपत्ति और असहमति दर्ज की थी. ऐसे में उन अधिकारियों और प्रतिनिधियों के खिलाफ प्रशासनिक दुरभिसंधि का मामला बिल्कुल बनता है जिनके कथित लोप के कारण थॉमस की नियुक्ति को हरी झण्डी मिलने की सम्भावना थी.

ऐसे अधिकारी भारत शासन के कार्मिक विभाग के अतिरिक्त गृह मंत्रालय और प्रधानमंत्री कार्यालय के भी होंगे. दुर्भाग्य से सुप्रीम कोर्ट ने भी इस मसले को इतने विस्तार से देखने की ज़रूरत नहीं समझी होगी क्योंकि न्यायालय के सामने तीन सदस्यीय चयन समिति के बहुमत निर्णय की समीक्षा का सवाल ही था.

परदे के पीछे यह क्यों नहीं समझा जाना चाहिए कि चयन समिति में गृहमंत्री प्रधानमंत्री और प्रतिपक्ष नेता के मुकाबले देश के एक मशहूर संविधानविद और वकील के रूप में विख्यात रहे हैं. चयन समिति की बैठक में सुषमा स्वराज के तर्कों को बहुमत द्वारा खारिज करने की पृष्ठभूमि में चिदंबरम की तर्कशीलता का प्रधानमंत्री के भी विवेक को झिंझोड़ने में कारण रहा होगा.

कांग्रेस के साथ यही दिक्कत है कि आज़ादी की लड़ाई में बड़े वकीलों मोहनदास करमचन्द गांधी, जवाहरलाल नेहरू, मोतीलाल नेहरू, भूलाभाई पटेल, सुभाषचन्द्र बोस आदि ने यदि उसका नेतृत्व किया तो बाद के वर्षों में ऐसे कई वकील हुए जिन्होंने कांग्रेस की दुर्गति करने में अपने कानूनी ज्ञान का आत्ममोह नहीं छोड़ा. यदि सिद्धार्थशंकर राय और हरिराम गोखले नहीं होते तो आपातकाल लगाने में इन्दिरा गांधी का सीधा-सीधा संशय था.

हंसराज भारद्वाज बहुत बड़े वकील कभी नहीं रहे लेकिन इन्दिरा गांधी के वंशजों से निकटता के कारण वे बड़े कांग्रेसी वकीलों को दरकिनार कर देश के कानून मंत्री पद पर जमे रहे. इन दिनों मंत्रिमण्डल में वकील कपिल सिब्बल धूमकेतु की तरह छा गए हैं. वे भूल जाते हैं कि वे संसद में हैं, सुप्रीम कोर्ट में नहीं जहां विरोधी वकील पर कटाक्ष करने का व्यावसायिक तार्किक हथियार समझा जाने से फीस में बढ़ोत्तरी हो जाती है. सिब्बल इसीलिए बाद में- सॉरी, सॉरी कहते नज़र आते हैं.

कांग्रेस के प्रवक्ताओं अभिषेक मनु सिंघवी, अश्विनी कुमार, मनीष तिवारी के तर्कों में वकालत के तेवर तो झलकते हैं लेकिन इन बेचारों ने अपनी शानदार ज़िंदगी जीने की व्यस्तता में कांग्रेस के संस्कारों से खुद को संपृक्त करने की नीयत कहां ढूंढ़ी होगी.

विचित्र संयोग है कि भाजपा भी इस जाल में फंसती जा रही है. राजनीति में कोई जनसमर्थन नहीं होने के बावज़ूद अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद जैसे वकील भाजपा का वाचाल चेहरा बने हुए हैं. वे अपनी छवि का तो बेहतर प्रदर्शन कर लेते हैं लेकिन उससे भाजपा की जनोन्मुखता का समीकरण अधिकतर हल नहीं हो पाता. अपने प्रतिस्पर्धी को परास्त करना वकालत का लक्षण है लेकिन अपने प्रतिस्पर्धी सहित उस विचारधारा के समर्थकों को भी परिवर्तित करना राजनीति का मकसद होता है. थॉमस के प्रकरण में उन्हें केन्द्रीय सतकर्ता आयुक्त बनाना धोखे या चूक का निर्णय नहीं है. वह देश के संविधान का विरोध है. थॉमस के प्रकरण में भाजपा द्वारा यह क्यों कहा जा रहा है कि यदि प्रधानमंत्री अपनी स्थिति स्पष्ट कर दें तो उसे संतोष हो जाएगा. प्रधानमंत्री ने आनन-फानन में अपनी स्थिति यह कहकर स्पष्ट कर दी कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का सम्मान करते हैं और इस गलत निर्णय की जिम्मेदारी लेते हैं. सुषमा स्वराज ने उस पर अपना संतोष भी आनन फानन में जाहिर कर दिया.

भाजपा अध्यक्ष नितिन गड़करी ने येदियुरप्पा के प्रकरण में साफ कहा था कि मुख्यमंत्री ने अनैतिक निर्णय किया है लेकिन अवैधानिक नहीं. इसलिए उनके इस्तीफे का सवाल नहीं है. थॉमस प्रकरण में तो प्रधानमंत्री और गृहमंत्री का निर्णय जाहिरा तौर पर अनैतिक और अवैधानिक दोनों है. तब गडकरी उनके इस्तीफे को राष्ट्रीय मुद्दा क्यों नहीं बनाते, साफ है कि जब तक डॉ. मनमोहन प्रधानमंत्री बने रहेंगे, भाजपा को उनकी सरकार पर घोटालों के लिए प्रहार करने के अवसर मिलते ही रहेंगे. इससे भविष्य में भाजपा के सत्तानशीन होने की संभावनाएं पुख्ता होती जाएंगी.

यक्ष प्रश्न यह है कि क्या इस राष्ट्रीय पार्टी को थॉमस, कलमाड़ी, काला धन, ए. राजा, इसरो और आदर्श सोसायटी जैसे और भी कई संभावित घपलों को अपनी पार्टी की सत्ता पर वापसी का रास्ता बनाना चाहिए या उसे देश की जनता की भावनाओं के अनुकूल भारत के इतिहास का साथ देना चाहिए.

प्रधानमंत्री न तो कहेंगे और न कोई उन पर दबाव डालेगा कि वे देश को बताएं कि उनका फैसला अनैतिक है या अवैधानिक. वे देश को क्यों नहीं बताते कि जिस पवित्र संविधान की उन्होंने कसम खाई है, उसका भी उल्लंघन उनके निर्णय के कारण हुआ है. गृहमंत्री भी इसमें बराबर के भागीदार हैं. ऐसे में कांग्रेस के इतिहास में कृष्ण मेनन, टी.टी. कृष्णमाचारी, लालबहादुर शास्त्री तो छोड़ें विलासराव देशमुख और अशोक चव्हाण या शशि थरूर के इस्तीफे तक नैतिक गौरव के सूचकांक पर जगह पाएंगे.

इस्तीफे की पेशकश करना और फिर बहस के बाद पूरी की पूरी लोकसभा प्रधानमंत्री को बने रहने की समझाइश यदि दे दे तो वह तो पाप शमन का एक तरीका हो सकता है. देश और इतिहास किसी भी राजनेता या राजनीतिक पार्टी से सदैव बड़े हैं. थॉमस के प्रकरण में उन्हें केन्द्रीय सतकर्ता आयुक्त बनाना धोखे या चूक का निर्णय नहीं है. वह देश के संविधान का विरोध है. वह एक सायास निर्णय है जो प्लेटो, चाणक्य, जॉन स्टुअर्ट मिल और डायसी जैसे असंख्य राजनीतिक विचारकों के द्वारा अभिनिर्धारित मानदण्ड का मज़ाक उड़ाता है. फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने देश के सर्वोच्च सतर्क पद को कूड़ाघर बनाने से बचाने में देश की मदद की है. उसे समकालीन भारत में गंदगी को बुहारने के बहुत उत्तदायित्व सरकारें देंगी.

काला धन भी बहुत से काले निर्णयों के कारण देश में लौटने वाला नहीं है. उसे लाने में भी शायद सुप्रीम कोर्ट को ही अक्षरों में काला सफेद करना होगा. कॉमनवेल्थ खेल घोटाला या आदर्श सोसायटी या 2जी स्पेक्ट्रम-सभी मामलों में सी. बी. आई. को इतनी ढिलाई के साथ काम करने के निर्देश दिखाई पड़ते हैं, जिससे वह चुटकुला दो तरह से पढ़ा जाने पर अलग अलग अर्थ में नज़र आते हैं जिसमें कहा गया- पकड़ो, मत जाने दो‘अथवा पकड़ो मत, जाने दो.‘

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले कई वर्षों से एक अनुदार संकोच ओढ़ लिया है कि उसे जनहित याचिकाओं को महत्व नहीं देना है. जनहित याचिकाओं का थोड़ा बहुत दुरुपयोग हुआ होगा. लेकिन इस नायाब नुस्खे ने भारतीय न्यायिक जीवन में नई आस्था का संचार भी किया है. जनहित याचिकाओं के विरोधी न्यायाधीश इतिहास में कृष्णा अय्यर और भगवती जैसे कालजयी न्यायविदों के मुकाबले कहां ठहर पाएंगे, जिन्हें सेवानिवृत्त होने के दूसरे ही दिन लोग भूल जाते हैं.

इतिहास कभी भी शासकों को उनकी मौत के बाद जीवित रहने का गौरव नहीं देता. यह गौरव उनको मिलता है जो मरते मनुष्य को जिलाने की कोशिश में अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं. न्यायिक सक्रियता के इस नए मौसम में देश और दुनिया को कुछ बेहतर महसूस हो रहा है. शुभ लक्षण वाली इतिहास की दायीं आंख फड़क रही है. वह साथ साथ सचेत कर रही है कि आंखें लगातार बहुत देर तक नहीं फड़कतीं. वे कभी कभी इसलिए भी फड़कती हैं कि आंख की शिराओं के आसपास वक्त की धमनियों में जनता का खून कम या ज़्यादा बहने लगता है.

 

(कनक तिवारी)

 
2 Comments

Posted by on March 7, 2011 in Uncategorized

 

2 responses to “थैंक यू, सुप्रीम कोर्ट

  1. Sudesh Verma

    March 12, 2011 at 8:17 am

    Supreme Court done their job better.

     
  2. Krishna

    March 22, 2011 at 11:46 am

    ummid ki kiran bas suprim court se hi baki hai. Neta to bhrastachar ki parkastha ko par kar chuke hai.

     

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