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बेशर्म बयान

20 Feb

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और गायक राहत फतेह अली ख़ान में क्या समानता है, इस सवाल का सीधा जवाब हो सकता है कि दोनों मुस्कुराते हुये बेशर्मी के साथ अपनी बात पेश करने में माहिर हैं. राहत फतेह अली खान जिस दिन पांच लाख डालर की अवैध रकम लेकर जाते पकड़े गये, उन्होंने बहुत भोलेपन के साथ तर्क दिया कि पांचवीं पास होने के कारण उन्हें उस कानून का पता नहीं था, जिसमें इतनी रकम ले जाना अवैध है.

अब तक के सर्वाधिक पढ़े-लिखे समझे जाने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी राहत फतेह अली के अंदाज में ही जवाब दे रहे हैं. पिछले दिनों इलेक्ट्रानिक मीडिया के संपादकों-पत्रकारों के साथ बातचीत में मजबूरी के परदे के पीछे अपनी सामूहिक जिम्मेवारी को प्रधानमंत्री ने किसी कव्वाल की मुद्रा में ही झटक दिया. प्रधानमंत्री के अधिकांश जवाब बिल्कुल उसी अंदाज में थे कि भाई, मैं तो परदेसी आदमी हूं, मुझे क्या पता कि ये चांद है या सूरज.

संभव है कि राहत फतेह अली ख़ान को भारतीय कानून की जानकारी नहीं हो या कम हो लेकिन अपने भ्रष्ट मंत्रिमंडल को नहीं जानने की बात करने वाले प्रधानमंत्री को यह तो पता ही होगा कि भारतीय कानून किसी अज्ञानी को अपराध की छूट नहीं देता, न ही उसके अज्ञानी होने से उसका अपराध या सजा कम होती है. अगर इसके बाद भी प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्हें इसका पता नहीं था कि उनके पीछे क्या कुछ चल रहा है तो इसके कारणों को समझना मुश्किल नहीं है.

अल्प स्मृति वाले भारतीय मानस में से कुछ लोगों को याद होगा कि यूटीआई का यूस 64 घोटाला उसी ज़माने में हुआ था, जब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री थे. इस घोटाले में लाखों मध्यमवर्गीय भारतीयों का पैसा डूब गया था. देश में जब शेयर बाज़ार घोटाले के साथ हर्षद मेहता भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा खलनायक बन कर उभरा, उस समय देश की आर्थिक बागडोर मनमोहन सिंह के ही पास थी. इस घोटाले पर मनमोहन सिंह ने संसद में बयान दिया था- “अगर शेयर बाजार में एक दिन उछाल आ जाए और दूसरे दिन गिरावट हो तो इसका मतलब यह नहीं कि मैं अपनी नींद हराम कर लूँ.”

मनमोहन सिंह की सफलता का सच राजा जैसे मंत्री हैं, बेतहाशा महंगाई है, कारपोरेट की लूट है और सरवाईवल फॉर द फिटेस्ट जैसे जुमले हैं.

लेकिन पूरे देश के करोड़ों लोगों की नींद हराम करने वाले मनमोहन सिंह संपादकों के साथ बातचीत में कहते हैं कि भ्रष्टाचार में लिप्त मंत्रियों के लिये वो इसलिये जिम्मेवार नहीं हैं क्योंकि वे मंत्री गठबंधन के दल द्वारा मनोनीत मंत्री हैं. इस बयान से लगता है कि मनमोहन सिंह अभी भी नींद में हैं या नींद में होने का नाटक कर रहे हैं.

यह बात बहुत साफ है कि प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल में कौन मंत्री होगा, यह तय करना प्रधानमंत्री की जिम्मेवारी होती है, यह उसका विशेषाधिकार होता है. ऐसे में किसी भी मंत्री को उसकी पार्टी द्वारा मनोनीत मंत्री बतलाना हास्यास्पद तो है ही, यह गैरजिम्मेदाराना भी है. इसका अर्थ तो यह हुआ कि गठबंधन सरकार के सारे मंत्री अपनी-अपनी पार्टियों से मनोनीत है और प्रधानमंत्री खुद मुख्तार और मजबूर हैं. भारतीय लोकतंत्र की इससे दुर्भाग्यजनक स्थिति नहीं हो सकती.

प्रधानमंत्री से पूछने का मन करता है कि क्या प्रधानमंत्री कारपोरेट हितों को भी इतने ही गैरजिम्मेदाराना ढंग से नकार सकते हैं? ज़ाहिर है, इसका जवाब ‘नहीं’ में ही होगा क्योंकि अंततः मंत्रिमंडल को लेकर उनका बेशर्म बयान उन कारपोरेट आकाओं को बचाने की ही तो कोशिश है, जो अरबों रुपये लूट कर इस देश के कानून को धता बता रहे हैं.

दिलचस्प यह भी है कि मंत्रियों की जिम्मेवारी नहीं लेने वाले प्रधानमंत्री दूसरी ओर दावा करते हैं कि उनका गठबंधन बहुत समन्वय से काम कर रहा है और गठबंधन में किसी तरह का मतभेद नहीं है. गोया वो यह बताने की कोशिश कर रहे हों कि भ्रष्टाचार भी इसी समन्वयपूर्वक काम करने का नतीजा है.

प्रधानमंत्री ने अपनी सफलता और गौरव के विषयों में दूसरे देशों के राष्ट्राध्यक्षों और सुरक्षा परिषद के पांच देशों के सदस्यों के भारत आगमन को भी गिनाया. लेकिन प्रधानमंत्री यह सब कहते हुये, यह बताना भूल गये कि इन राष्ट्राध्यक्षों ने अपने देश के लोगों के लिये लगभग ढ़ाई लाख रोजगार के अवसर सृजित किये. क्या मनमोहन सिंह भारत के लिये भी ऐसा कोई अवसर कहीं तलाश पाये ? अगर नहीं तो फिर इन राष्ट्राध्यक्षों की यात्रा किसके लिये सफलता का विषय है?

मनमोहन सिंह की सफलता का सच राजा जैसे मंत्री हैं, बेतहाशा महंगाई है, कारपोरेट की लूट है और सरवाईवल फॉर द फिटेस्ट जैसे जुमले हैं. मनमोहन सिंह की सफलता में बराक ओबामा जैसे राष्ट्रपति भी शामिल हैं, जो कहते हैं कि मनमोहन सिंह को पूरी दुनिया गंभीरता से सुनती है. ओबामा अपने साम्राज्यवादी विस्तार के लिये इस तरह के चुटकुले सुनाते हैं और दुर्भाग्य से उसे सच मान लिया जाता है. कौन जाने, चरमराती अर्थव्यवस्था और इतिहास के वृहत्तर घोटालों के बीच मनमोहन सिंह को शायद ओबामा के चुटकुले पर ही हंसी आ रही हो !

 
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Posted by on February 20, 2011 in Uncategorized

 

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