RSS

क्या वास्तव में मनुस्मृति दलित विरोधी है?

क्या वास्तव में मनुस्मृति दलित विरोधी है?- जैसाकि कुछेक राजनैतिक व सामाजिक संगठन अपनी दुकानदारी चलाने के लिए दावा करते है|हालांकि उनके दावों को परखने के लिए जरुरी है मनु ने मनुस्मृति में क्या लिखा है, इसकी पड़ताल की जाये, प्रस्तुत आलेख इसी तथ्य की पड़ताल करती है-

मनु कहते हैं- जन्मना जायते शूद्र: कर्मणा द्विज उच्यते। अर्थात जन्म से सभी शूद्र होते हैं और कर्म से ही वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र बनते हैं। वर्तमान दौर में ‘मनुवाद’ शब्द को नकारात्मक अर्थों में लिया जा रहा है। ब्राह्मणवाद को भी मनुवाद के ही पर्यायवाची के रूप में उपयोग किया जाता है। वास्तविकता में तो मनुवाद की रट लगाने वाले लोग मनु अथवा मनुस्मृति के बारे में जानते ही नहीं है या फिर अपने निहित स्वार्थों के लिए मनुवाद का राग अलापते रहते हैं। दरअसल, जिस जाति व्यवस्था के लिए मनुस्मृति को दोषी ठहराया जाता है, उसमें जातिवाद का उल्लेख तक नहीं है। × क्या है मनुवाद : जब हम बार-बार मनुवाद शब्द सुनते हैं तो हमारे मन में भी सवाल कौंधता है कि आखिर यह मनुवाद है क्या? महर्षि मनु मानव संविधान के प्रथम प्रवक्ता और आदि शासक माने जाते हैं। मनु की संतान होने के कारण ही मनुष्यों को मानव या मनुष्य कहा जाता है। अर्थात मनु की संतान ही मनुष्य है। सृष्टि के सभी प्राणियों में एकमात्र मनुष्य ही है जिसे विचारशक्ति प्राप्त है। मनु ने मनुस्मृ‍ति में समाज संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उसे ही सकारात्मक अर्थों में मनुवाद कहा जा सकता है।

मनुस्मृति : समाज के संचालन के लिए जो व्यवस्थाएं दी हैं, उन सबका संग्रह मनुस्मृति में है। अर्थात मनुस्मृति मानव समाज का प्रथम संविधान है, न्याय व्यवस्था का शास्त्र है। यह वेदों के अनुकूल है। वेद की कानून व्यवस्था अथवा न्याय व्यवस्था को कर्तव्य व्यवस्था भी कहा गया है। उसी के आधार पर मनु ने सरल भाषा में मनुस्मृति का निर्माण किया। वैदिक दर्शन में संविधान या कानून का नाम ही धर्मशास्त्र है। महर्षि मनु कहते है- धर्मो रक्षति रक्षित:। अर्थात जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। यदि वर्तमान संदर्भ में कहें तो जो कानून की रक्षा करता है कानून उसकी रक्षा करता है। कानून सबके लिए अनिवार्य तथा समान होता है।

जिन्हें हम वर्तमान समय में धर्म कहते हैं दरअसल वे संप्रदाय हैं। धर्म का अर्थ है जिसको धारण किया जाता है और मनुष्य का धारक तत्व है मनुष्यता, मानवता। मानवता ही मनुष्य का एकमात्र धर्म है। हिन्दू मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध, सिख आदि धर्म नहीं मत हैं, संप्रदाय हैं। संस्कृत के धर्म शब्द का पर्यायवाची संसार की अन्य किसी भाषा में नहीं है। भ्रांतिवश अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ शब्द को ही धर्म मान लिया गया है, जो कि नितांत गलत है। इसका सही अर्थ संप्रदाय है। धर्म के निकट यदि अंग्रेजी का कोई शब्द लिया जाए तो वह ‘ड्यूटी’ हो सकता है। कानून ड्‍यूटी यानी कर्तव्य की बात करता है।

मनु ने भी कर्तव्य पालन पर सर्वाधिक बल दिया है। उसी कर्तव्यशास्त्र का नाम मानव धर्मशास्त्र या मनुस्मृति है। आजकल अधिकारों की बात ज्यादा की जाती है, कर्तव्यों की बात कोई नहीं करता। इसीलिए समाज में विसंगतियां देखने को मिलती हैं। मनुस्मृति के आधार पर ही आगे चलकर महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी धर्मशास्त्र का निर्माण किया जिसे याज्ञवल्क्य स्मृति के नाम से जाना जाता है। अंग्रेजी काल में भी भारत की कानून व्यवस्था का मूल आधार मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति रहा है। कानून के विद्यार्थी इसे भली-भांति जानते हैं। राजस्थान हाईकोर्ट में मनु की प्रतिमा भी स्थापित है।

*मनुस्मृति में दलित विरोध :* मनुस्मृति न तो दलित विरोधी है और न ही ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देती है। यह सिर्फ मानवता की बात करती है और मानवीय कर्तव्यों की बात करती है। मनु किसी को दलित नहीं मानते। दलित संबंधी व्यवस्थाएं तो अंग्रेजों और आधुनिकवादियों की देन हैं। दलित शब्द प्राचीन संस्कृति में है ही नहीं। चार वर्ण जाति न होकर मनुष्य की चार श्रेणियां हैं, जो पूरी तरह उसकी योग्यता पर आधारित है। प्रथम ब्राह्मण, द्वितीय क्षत्रिय, तृतीय वैश्य और चतुर्थ शूद्र। वर्तमान संदर्भ में भी यदि हम देखें तो शासन-प्रशासन को संचालन के लिए लोगों को चार श्रेणियों- प्रथम, द्वितीय, तृतीय और चतुर्थ श्रेणी में बांटा गया है। मनु की व्यवस्था के अनुसार हम प्रथम श्रेणी को ब्राह्मण, द्वितीय को क्षत्रिय, तृतीय को वैश्य और चतुर्थ को शूद्र की श्रेणी में रख सकते हैं। जन्म के आधार पर फिर उसकी जाति कोई भी हो सकती है। मनुस्मृति एक ही मनुष्य जाति को मानती है। उस मनुष्य जाति के दो भेद हैं। वे हैं पुरुष और स्त्री।

मनु कहते हैं- ‘जन्मना जायते शूद्र:’ अर्थात जन्म से तो सभी मनुष्य शूद्र के रूप में ही पैदा होते हैं। बाद में योग्यता के आधार पर ही व्यक्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र बनता है। मनु की व्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण की संतान यदि अयोग्य है तो वह अपनी योग्यता के अनुसार चतुर्थ श्रेणी या शूद्र बन जाती है। ऐसे ही चतुर्थ श्रेणी अथवा शूद्र की संतान योग्यता के आधार पर प्रथम श्रेणी अथवा ब्राह्मण बन सकती है। हमारे प्राचीन समाज में ऐसे कई उदाहरण है, जब व्यक्ति शूद्र से ब्राह्मण बना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम के गुरु वशिष्ठ महाशूद्र चांडाल की संतान थे, लेकिन अपनी योग्यता के बल पर वे ब्रह्मर्षि बने। एक मछुआ (निषाद) मां की संतान व्यास महर्षि व्यास बने। आज भी कथा-भागवत शुरू होने से पहले व्यास पीठ पूजन की परंपरा है। विश्वामित्र अपनी योग्यता से क्षत्रिय से ब्रह्मर्षि बने। ऐसे और भी कई उदाहरण हमारे ग्रंथों में मौजूद हैं, जिनसे इन आरोपों का स्वत: ही खंडन होता है कि मनु दलित विरोधी थे।

ब्राह्मणोsस्य मुखमासीद्‍ बाहु राजन्य कृत:।उरु तदस्य यद्वैश्य: पद्मयां शूद्रो अजायत। (ऋग्वेद)

अर्थात ब्राह्णों की उत्पत्ति ब्रह्मा के मुख से, भुजाओं से क्षत्रिय, उदर से वैश्य तथा पांवों से शूद्रों की उत्पत्ति हुई। दरअसल, कुछ अंग्रेजों या अन्य लोगों के गलत भाष्य के कारण शूद्रों को पैरों से उत्पन्न बताने के कारण निकृष्ट मान लिया गया, जबकि हकीकत में पांव श्रम का प्रतीक हैं। ब्रह्मा के मुख से पैदा होने से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या समूह से है जिसका कार्य बुद्धि से संबंधित है अर्थात अध्ययन और अध्यापन। आज के बुद्धिजीवी वर्ग को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं। भुजा से उत्पन्न क्षत्रिय वर्ण अर्थात आज का रक्षक वर्ग या सुरक्षाबलों में कार्यरत व्यक्ति। उदर से पैदा हुआ वैश्य अर्थात उत्पादक या व्यापारी वर्ग। अंत में चरणों से उत्पन्न शूद्र वर्ग।

यहां यह देखने और समझने की जरूरत है कि पांवों से उत्पन्न होने के कारण इस वर्ग को अपवित्र या निकृष्ट बताने की साजिश की गई है, जबकि मनु के अनुसार यह ऐसा वर्ग है जो न तो बुद्धि का उपयोग कर सकता है, न ही उसके शरीर में पर्याप्त बल है और व्यापार कर्म करने में भी वह सक्षम नहीं है। ऐसे में वह सेवा कार्य अथवा श्रमिक के रूप में कार्य कर समाज में अपने योगदान दे सकता है। आज का श्रमिक वर्ग अथवा चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी मनु की व्यवस्था के अनुसार शूद्र ही है। चाहे वह फिर किसी भी जाति या वर्ण का क्यों न हो।

वर्ण विभाजन को शरीर के अंगों को माध्यम से समझाने का उद्देश्य उसकी उपयोगिता या महत्व बताना है न कि किसी एक को श्रेष्ठ अथवा दूसरे को निकृष्ट। क्योंकि शरीर का हर अंग एक दूसरे पर आश्रित है। पैरों को शरीर से अलग कर क्या एक स्वस्थ शरीर की कल्पना की जा सकती है? इसी तरह चतुर्वण के बिना स्वस्थ समाज की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

*ब्राह्मणवाद की हकीकत :* ब्राह्मणवाद मनु की देन नहीं है। इसके लिए कुछ निहित स्वार्थी तत्व ही जिम्मेदार हैं। प्राचीन काल में भी ऐसे लोग रहे होंगे जिन्होंने अपनी अयोग्य संतानों को अपने जैसा बनाए रखने अथवा उन्हें आगे बढ़ाने के लिए लिए अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल किया होगा। वर्तमान संदर्भ में व्यापम घोटाला इसका सटीक उदाहरण हो सकता है। क्योंकि कुछ लोगों ने भ्रष्टाचार के माध्यम से अपनी अयोग्य संतानों को भी डॉक्टर बना दिया।

हमारे संविधान में कहीं नहीं लिखा भ्रष्ट तरीके अपनाकर अपनी अयोग्य संतानों को आगे बढाएं। इसके लिए तत्कालीन समाज या फिर व्यक्ति ही दोषी हैं। उदाहरण के लिए संविधान निर्माता बाबा साहेब अंबेडकर ने संविधान में आरक्षण की व्यवस्था 10 साल के लिए की थी, लेकिन बाद में राजनीतिक स्वार्थों के चलते इसे आगे बढ़ाया जाता रहा। ऐसे में बाबा साहेब का क्या दोष?

मनु तो सबके लिए शिक्षा की व्यवस्था अनिवार्य करते हैं। बिना पढ़े लिखे को विवाह का अधिकार भी नहीं देते, जबकि वर्तमान में आजादी के 70 साल बाद भी देश का एक वर्ग आज भी अनपढ़ है। मनुस्मृति को नहीं समझ पाने का सबसे बड़ा कारण अंग्रेजों ने उसके शब्दश: भाष्य किए। जिससे अर्थ का अनर्थ हुआ। पाश्चात्य लोगों और वामपंथियों ने धर्मग्रंथों को लेकर लोगों में भ्रांतियां भी फैलाईं। इसीलिए मनुवाद या ब्राह्मणवाद का हल्ला ज्यादा मचा।

मनुस्मृति या भारतीय धर्मग्रंथों को मौलिक रूप में और उसके सही भाव को समझकर पढ़ना चाहिए। विद्वानों को भी सही और मौलिक बातों को सामने लाना चाहिए। तभी लोगों की धारणा बदलेगी। दाराशिकोह उपनिषद पढ़कर भारतीय धर्मग्रंथों का भक्त बन गया था। इतिहास में उसका नाम उदार बादशाह के नाम से दर्ज है। फ्रेंच विद्वान जैकालियट ने अपनी पुस्तक ‘बाइबिल इन इंडिया’ में भारतीय ज्ञान विज्ञान की खुलकर प्रशंसा की है।

पंडित, पुजारी बनने के ब्राह्मण होना जरूरी है : पंडित और पुजारी तो ब्राह्मण ही बनेगा, लेकिन उसका जन्मगत ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। यहां ब्राह्मण से मतलब श्रेष्ठ व्यक्ति से न कि जातिगत। आज भी सेना में धर्मगुरु पद के लिए जातिगत रूप से ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है बल्कि योग्य होना आवश्यक है। ऋषि दयानंद की संस्था आर्यसमाज में हजारों विद्वान हैं जो जन्म से ब्राह्मण नहीं हैं। इनमें सैकड़ों पूरोहित जन्म से दलित वर्ग से आते हैं।

शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम।क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च। (10/65)

महर्षि मनु कहते हैं कि कर्म के अनुसार ब्राह्मण शूद्रता को प्राप्त हो जाता है और शूद्र ब्राह्मणत्व को। इसी प्रकार क्षत्रिय और वैश्य से उत्पन्न संतान भी अन्य वर्णों को प्राप्त हो जाया करती हैं। विद्या और योग्यता के अनुसार सभी वर्णों की संतानें अन्य वर्ण में जा सकती हैं।

Advertisements
 
Leave a comment

Posted by on October 9, 2017 in Uncategorized

 

वामपंथ का ब्लैक एंड व्हाइट

‘कितनी आसानी से मशहूर किया है खुद को, मैंने अपने से बड़े शख्स को गाली दी’

एक छात्र जिसने अभी यूनीवर्सिटी से बाहर कदम भी नहीं रखा है, एक छात्र जिसने हर जाति, धर्म और वर्ग के लोगों के साथ पढ़ाई की है, एक छात्र जिसने अभी हिंदुस्तान को सिर्फ किताबों में पढ़ा है वो छात्र देश के प्रधानमंत्री का कॉलर पकड़कर सवाल करना चाहता है, वो छात्र जातिवाद से त्रस्त है और वो छात्र देश की सेना पर बलात्कारी होने का आरोप मढ़ रहा है. फिर भी वो आजाद है देश भर की मीडिया के सामने मुट्ठी तानने के लिए, वो आजाद है खुले आम प्रेस कॉफ्रेंस करने के लिए, वो आजाद है देश के टुकड़े करने वालों की मंशा के साथ खड़ा होने के लिए. शायद यही लोकतंत्र है और शायद यही इस लोकतंत्र की खूबसूरती. लोग तालियां बजा रहे हैं, कन्हैया में नेता तुम्हीं हो कल के देख रहे हैं.

लेकिन एक सवाल यहां खड़ा होता है जो सीधे सीधे भारत के एक वर्ग के मिजाज को असमंजस के कठघरे में खड़ा करता है और वो सवाल करोड़ों लोगों का भी हो सकता है कि आखिर देश इतनी जल्दबाजी में क्यों है जो अपरिपक्वता को भी आसानी से स्वीकार करने के लिए आतुर है. जेल से छूटने के बाद कन्हैया ने कहा कि पूर्व आरएसएस प्रमुख गोलवलकर की मुलाकात मुसोलिनी से हुई थी. जबकि सच्चाई ये है कि मार्च 1931 में गोलवलकर नहीं डॉ बी एस मुंजे थे जो मुसोलिनी से मिले थे इस में गलती कन्हैया की नहीं है दूसरी गोल मेज कांफ्रेस से लौटते वक्त मुंजे ने यूरोप का रुख किया था और वो वहां कुछ दिन इटली में रुके. इसके बाद मुंजे ने कई मिलिट्री स्कूल और उनकी शिक्षा प्रणाली को समझा और अध्ययन किया. जिसके बाद भारत में भी उन्होंने सन् 1939 मिलेट्री स्कूल की नींव रखी. मुंजे ने जीवन भर अछूतों, दलित और अनाथों के लिए कई शिक्षण संस्थान खोले. यहां ये ध्यान रखना जरूरी है कि उस वक्त ना तो द्वितीय विश्य युद्ध की कोई सुगबुगाहट थी और ना ही मुसोलिनी कोई खलनायक नहीं था. यहां सवाल ये है कि इसी तरह ही तो सुभाष चंद्र बोस खुद हिटलर से मिले थे वो भी दूसरे विश्व युद्ध से कुछ पहले.

ये भी पढ़ें- काश, ऐसा होता तो जेएनयू पर सवाल ही न उठते

अब बात करते हैं न्यायिक हत्या की जैसा कि कन्हैया ने अपने तथाकथित आजादी वाले भाषण में कहा कि मकबूल भट्ट और अफजल गुरू को सजा नहीं मिली थी बल्कि उनकी न्यायिक हत्या हुई थी. अब एक सवाल क्या कन्हैया या और कोई कम्युनिस्ट नेता रवींद्र म्हात्रे को जानता है? अगर यही बात यूं ही किसी कम्युनिस्ट नेता से पूछें, तो शायद ही कोई बता पाएगा. सरकारी फाइलों में रवींद्र म्हात्रे के नाम पर एक पुल है और एक मैदान. इसके उलट अफजल गुरु या मकबूल बट के बारे में पूछें, तो बताने वालों की संख्या एकदम उल्टी हो जाएगी. यानी एकाध लोगों को छोड़कर सभी लोग बता देंगें कि दोनों कौन थे. रवींद्र म्हात्रे ब्रिटेन में भारतीय राजनयिक थे, 3 फरवरी 1984, जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के सहयोगी संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन आर्मी के आतंकवादियों ने बर्मिंघम में उन्हें अपहृत कर लिया. आतंकवादियों ने उसी दिन शाम 7 बजे तक भारत के सामने जेल में बंद मकबूल भट को छोड़ने और दस लाख ब्रिटिश पाउंड की मांग रखी. छह फरवरी को आतंकियों ने म्हात्रे का कत्ल कर दिया. म्हात्रे के सिर में दो गोली मारी गई थी. म्हात्रे की हत्या के बाद 11 फरवरी 1984 को मकबूल बट को तिहाड़ जेल में फांसी पर लटका दिया गया और उसके शव को जेल में ही दफना दिया गया. 4 नवंबर 1989 नीलकंठ गंजू जिन्होंने अमर चाँद हत्या के मामले में मकबूल को सजा सुनाई थी. उनकी जे.के.ल.फ के आतंकवादियों ने सरेआम गोली मार कर हत्या कर दी. तब किसी कम्युनिस्ट नेता ने नीलकंठ गंजू, रवींद्र म्हात्रे के हत्या पर हो-हल्ला नहीं किया, क्योंकि मरने वाले किसी का वोट बैंक नहीं थे. ध्यान रहे ये दोनों वही हैं जिनके लिए पूरा विपक्ष और कम्युनिस्ट दल देश की ईंट से ईंट बजाने की कोशिश कर रहे हैं. कांग्रेस की भूमिका तो खैर हास्यास्पद है जिसमें सत्ता खोने की खीझ ज्यादा नजर आती है.

जेएनयू में जो कुछ भी हो रहा उसमें कुछ नया नहीं है और न ये पहली बार हो रहा है. दरअसल जेएनयू में जो भी सतही तौर पर दिख रहा है, संकट वो नहीं है. मुसीबत ये है कि जेएनयू ने जो प्रतिष्ठा हासिल की, वहां उसके मंच पर ये सब हो रहा है. परिसर में ऐसी घटनाएं होती रही हैं जो देश की अखंडता पर सवाल उठाती हैं. ऐसी घटनाएं कम्युनिस्टों की उस सोच का आईना हैं जो अब तक ये तय नहीं कर पाए हैं कि उनकी लड़ाई भारतीय राज्यव्यवस्था से है या भारतीयता से है. इतिहास के पन्नों को जरा उलट के देखा जाए तो कोई भी समझ जायेगा इस लड़ाई का रूख क्या है और गलती कहां है. मसलन 1962 का भारत चीन युद्ध, कम्युनिस्ट का झुकाव चीन की तरफ था. साम्यवादी ये तय नहीं कर पा रहे थे कि किस ने किस पर हमला किया. इसके लिए 32 लोगों की कमेटी का गठन किया गया, जिसमें उस वक्त के दिग्गज कम्युनिस्ट नेता ई.एम.एस नंबूदरीपाद, हरकिशन सिंह सुरजीत, ज्योति बसु शामिल थे. बाद में उस कमेटी ने ये फैसला दिया कि ये चीनी आक्रमण नहीं बल्कि भारत का हमला है चीन पर. आज़ादी के बाद ये पहली बार था जब कम्युनिस्ट भारतीय जनभावना के उलट जा कर पार्टी के फैसले ले रहे थे. 1962 में चीन का समर्थन करने के पीछे कम्युनिस्ट पार्टी ने ये माना कि चीन का आक्रमण, एक कम्युनिस्ट राज्य का एक कैपिटलिस्ट राजव्यवस्था पर हमला है और अंततोगत्वा फायदा इनकी विचारधारा का ही है. इनका मानना था कि लाल क्रांति तब और ज्यादा आसानी से संभव है जब चीन पूर्णत भारत पर विजय हासिल कर ले.

इमरजेंसी में जब सारा विपक्ष एकजुट था और सरकार के तानाशाही का मुकाबला कर रहा था तब भी इन्होंने भारतीय जनभावना के साथ न जा कर सरकार का साथ दिया. उनको लगा कि इस बार क्रांति की धारा नीचे से न फूट कर इसकी शुरुआत सत्ता के केंद्र से हुई है. इस वजह से कम्युनिस्टों ने फिर एक बार गलत का साथ दिया. और अपनी क्रांति, विचारधारा को भारतीय जनभावना से और दूर ले गए.

ये भी पढ़ें- जेएनयू की अति-बैद्धिकता, लाल-आतंकवाद और बस्तर

अगर सिर्फ जेएनयू की बात करें, तो नक्सलियों के लिए इनका प्रेम जगजाहिर है. राष्ट्रविरोध से जुड़ा सबसे बड़ा वाक्या जो जहन में आता है साल 2010 का दंतेवाड़ा का है. जहां कुछ नक्सलियों ने कायरों की तरह छुप के पुलिस गश्ती दल पर हमला कर के 76 जवानों को मार दिया. उसकी प्रतिक्रिया यहां दिल्ली में बैठे माओ और मार्क्स के चेलों ने जेएनयू में जश्न मना कर दिया, खैर ये मामला तब भी कुछ अखबारों ने छापा मगर तब भी यूपीए सरकार चेती नहीं. दरअसल कम्युनिस्टों की दिक्कत ही यही है वो अपने शुरुआती दौर से लेकर अभी तक अपने पूरे आंदोलन या विरोध का भारतीयकरण करने में कामयाब नहीं हो सके. जैसा की चीन में हुआ और सफल भी रहा. एक देश में कई धर्म और पंथ हो सकते है या होते हैं. यही धर्म और पंथ जब समग्र रूप में मिल जाते हैं या देखे जाते हैं तब उस देश की संस्कृति और सभ्यता का निर्माण होता है. मगर एक आँख से सोवियत और दूसरे से चीन को देखने में भारत और भारतीयता कही पीछे छूट गई. धर्म और संस्कृति में क्या भेद है ये न समझ पाना भी एक वजह है जिस से इनका संघर्ष कुछ लोगों में सिमट कर रह गया. इन्होंने धर्म को तो नकारा ही भारतीय संस्कृति का भी कई मायनों में विरोध किया. कम्युनिस्टों में संघर्ष और संगठन की गजब की काबिलियत है. लेकिन भारतीय साम्यवाद के तो मायने ही अलग हैं जो हमेशा सत्ता पक्ष के साथ खड़ा है.

अजीब सी बात है इन कम्युनिस्टों को अफजल गुरु, मकबूल बट, इशरतजहां की मासूमियत दिखती है मगर उन 76 जवानों का परिवार नहीं दिखता जो नक्सलियों से लड़ते हुए शहीद हो गए. उनके बच्चों के आंसू भी इन्हें नहीं दिखते. इन्हें कश्मीर, फिलिस्तीन दिखता है मगर कश्मीरी पंडितों का दर्द नहीं दिखता, तिब्बत, बलूचिस्तान नहीं दिखता. कन्हैया और कुछ कॉमरेड प्रोफेसर लगतार कश्मीर, गाजा और न जाने क्या क्या की आजादी की मांग करते रहे है. मगर जो बात वामपंथी बुद्धिजीवी भूल जाते हैं या जानबूझकर आंखें मूंदे रहते हैं वो ये है कि कम्युनिस्ट चीन का जबरन कब्जा तिब्बत है. ये अफजल गुरु के फांसी को गलत साबित करने के लिए दुनिया भर की दलीलें देंगे, कोर्ट के फैसले तक को अपनी वैचारिक अदालत में गलत, दोष, भावभेद वाला फैसला बता देंगे, मगर इनके तर्क भी इनकी सोच की तरह एक आयामी हैं. अफज़ल को बेगुनाह बताते वक़्त, अदालत पर सवाल उठाते वक्त ये भूल जाते हैं कि जिस कोर्ट ने अफजल को सजा दी उसी कोर्ट ने एस.ए.आर गिलानी को दोष मुक्त करते हुए बाइज्जत बरी किया तब किसी ने इस फैसले पर सवाल नहीं किया.

ये भी पढ़ें- प्रसिद्धि पाने का ‘दो दुनी पांच’ तरीका इनका दोहरा चेहरा दलितों के मामले भी नजर आता है. दलितों की आवाज होने का दावा सीपीआई (एम) तब से कर रही है जिस दिन से ये पार्टी बनी है. अभी हाल में रोहित के मामले पर कितना हो हल्ला किया गया मगर ये बात किसी ने न सोची न ही पूछी कि जिन दलितों की बहुत बड़ी संख्या इनकी पार्टी में है. क्या उस में से एक भी ऐसा कार्यकर्ता नहीं है जिसको ये अपने पोलित ब्यूरो या सेंट्रल कमेटी में ले सकें. पार्टी बनने के बाद से आज तक कोई भी दलित इनकी मुख्य समिति में नहीं रहा है न ही पोलित ब्यूरो में न सेंट्रल कमेटी में. ये कैसी आवाज है दलितों की जिसके विलाप में रुदन तो बहुत है मगर दर्द नहीं है. जो समस्या तो जानता है मगर उसका हल देना नहीं चाहता.

दरअसल कारण साफ है कि देश में वामपंथियों को अपना आखिरी किला भी ध्वस्त होता हुआ दिख रहा है. राजनीति में इनकी निरर्थकता लगभग जगजाहिर है और अकादमिक संस्थानों में जो रही-सही उपस्थिति है वह भी खात्मे की ओर है. ऐसे में यह अशांति और आक्रोश असल में कुंठा है और कन्हैया जैसे लोगों में इन्हें रोशनी की आखिरी चिंगारी दिखती है. जबकि इतिहास ने बार बार साबित किया है कि कन्हैया जैसे लोग सिर्फ मोहरे होते हैं स्थापित पार्टिंयों के लिए. जो पहले भी आते थे, आगे भी आते रहेंगे.

 
Leave a comment

Posted by on March 20, 2016 in Uncategorized

 

सत्ता की ताकत तले ढहते संस्थान

याद कीजिये तो एक वक्त सीबीआई, सीवीसी और सीएजी सरीखे संवैधानिक संस्थानों की साख को लेकर आवाज उठी थी। वह दौर मनमोहन सिंह का था और आवाज उठाने वाले बीजेपी के वही नेता थे जो आज सत्ता में हैं। और अब प्रधानमंत्री मोदी की सत्ता के आगे नतमस्तक होते तमाम संस्थानों की साख को लेकर कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष ही सवाल उठा रहा है। तो क्या आपातकाल के चालीस बरस बाद संस्थानों के ढहने और राजनीतिक सत्ता की आकूत ताकत के आगे लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल रही है। यानी आपातकाल के चालीस बरस बाद यह सवाल बड़ा होने लगा है कि देश में राजनीतिक सत्ता की अकूत ताकत के आगे क्यों कोई संस्था काम कर नहीं सकती या फिर राजनीतिक सत्ता में लोकतंत्र के हर पाये को मान लिया जा रहा है। क्योंकि इसी दौर में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर संसद की स्टैंन्डिग कमेटी बेमानी साबित की जाने लगी। राज्य सभा की जरुरत को लेकर सवाल उठने लगे और ऊपरी सदन को सरकार के कामकाज में बाधा माना जाने लगा।

न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सत्ता ने सवाल उठाये। कोलेजियम के जरीये न्यायपालिका की पारदर्शिता देखी जाने लगी। कारपोरेट पूंजी के आसरे हर संस्थान को विकास से जोड़कर एक नई परिभाषा तय की जाने लगी। कामगार यूनियनें बेमानी करार दे दी गई या माहौल ही ऐसा बना दिया गया है जहां विकास के रास्ते में यूनियन का कामकाज रोड़ा लगने लगे। किसानो से जुड़े सवाल विकास की योजनाओं के सामने कैसे खारिज हो सकते है यह आर्थिक सुधार के नाम पर खुल कर उभरा। सत्ताधारी के सामने नौकरशाही चूहे में बदलती दिखी और यह सब झटके में हो गया ऐसा भी नहीं है । बल्कि आर्थिक सुधार के बाद देश को जिस रास्ते पर लाने का प्रयास किया गया उसमें ‘ पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा / द्रविड, उत्कल बंग …” सरीखी सोच खारिज होने लगी। क्योकि भारत की विवधता, भारत के अनेक रंगो को पूंजी के धागे में कुछ इस तरह पिरोने की कोशिश शुरु हुई कि देश के विकास या उसके बौद्दिक होने तक को मुनाफा से जोडा जाने लगा। असर इसी का है कि विदेशी पूंजी के बगैर भारत में कोई उत्पाद बन नहीं सकता है यह संदेश जोर-शोर से दी जाने लगी । लेकिन संकट तो इसके भी आगे का है।

भारत को लेकर जो समझ संविधान या राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान तक में झलकती है उसे सत्ता ने अपने अनुकूल विचारधारा के जरीये हडपने की समझ भी विकसित कर ली। असर इसी का हुआ कि बाजारवाद की विचारधारा ने विकास के नाम पर संस्थानों के दरवाजे बंद कर दिये। तो एक वक्त सूचना के अधिकार के नाम पर हर संस्थान के दरवाजे थोड़े बहुत खोल कर लोकतंत्र की हवा सत्ता के जरीये बहाने की कोशिश हुई। तो मौजूदा वक्त में जनादेश के आसे सत्ता पाने वालो ने खुद को ही लोकतंत्र मान लिया और हर दरवाजे अपने लिये खोल कर साफ संकेत देने की कोशिश शुरु की पांच बरस तक सत्ता की हर पहल देश के लिये है। तो इस घड़ी में सूचना का अधिकार सत्ता की पंसद नापंसद पर आ टिका और सत्ता जिस विचारधारा से निकली उसे राष्ट्रीय धारा मान कर राष्ट्रवाद की परिकल्पना भी सियासी विचारधारा के मातहत ही परिभाषित करने की कोशिश शुरु हुई।

इसी का असर नये तरीके से शुरु हुआ कि हर क्षेत्र में सत्ता की मातृ विचारधारा को ही राष्ट्र की विचारधारा मानकर संविधान की उस डोर को ही खत्म करने की पहल होने लगी जिसमें नागरिक के अधिकार राजनीतिक सत्ता से जुड़े बगैर मिल नहीं सकते। हर संस्थान के बोर्ड में संघ के पंसदीदा की नियुक्ती होने लगी। गुड गवर्नेंस को झटके में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आईने में कैसे उतारा गया यह किसी को पता भी नहीं चला या कहे सबको पता चला लेकिन इसे सत्ता का अधिकार मान लिया गया। बच्चों के मन से लेकर देश के धन तक पर एक ही विचारधारा के लोग कैसे काबिज हो सारे यत्न इसी के लिये किये जाने लगे। नवोदय विघालय हो या सीबाएसई बोर्ड। देश के 45 केन्द्रीय विश्विघालय हो या उच्च शिक्षा के संस्थान आईआईटी या आईआईएम हर जगह को भगवा रंग में रंगने की कोशिश शुरु हुई। उच्च शिक्षण संस्थानों की स्वायत्ता को सत्ता अपने अधिन लाने के लिये मशक्कत करने लगी। और विचारधारा के स्तर पर शिमला का इंडियन काउंसिल आफ हिस्टोरिकल रिसर्च रेसंटर हो या इंडियन काउंसिल आफ सोशल साइंस रिसर्च या फिर एनसीईआरटी हो या यूजीसी। बोर्ड में ज्ञान की परिभाषा विचारधारा से जोड़कर देखी जाने लगी। यानी पश्चमी सोच को शिक्षा में क्यो मान्यता दें जब भारत की सांस्कृतिक विरासत ने दुनिया को रोशनी दी। और राष्ट्रवाद की इस सोच से ओत प्रोत होकर तमाम संस्थानो में वैसे ही लोग निर्णय लेने वाली जगह पर नियुक्त होने लगे जो सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बीजेपी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक रहे। यानी यहाँ भी यह जरुरी नहीं है कि वाकई जो संघ की समझ हेडगेवार से लेकर गोलवरकर होते हुये देवरस तक बनी उसकी कोई समझ नियुक्त किये गये लोगो में होगी या फिर श्यामाप्रसाद मुखर्जी या दीन दयाल उपाध्याय की राजनीतिक सोच को समझने-जानने वाले लोगो को पदों पर बैठाया गया।

दरअसल सत्ता के चापलूस या दरबारियो को ही संस्थानों में नियुक्त कर अधिकार दे दिये गये जो सत्ता या संघ का नाम जपते हुये दिखे। यानी पदों पर बैठे महानुभाव अगर सत्ता या संघ पाठ अविरल करते रहेंगे तो संघ का विस्तार होगा और सत्ता ताकतवर होगी यह सोच नये तरीके से विचारधारा के नाम पर विकसित हुई। जिसने उन संस्थानों की नींव को ही खोखला करना शुरु कर दिया जिन संस्थानों की पहचान दुनिया में रही। आईसीसीआर हो या पुणे का फिल्म इस्टीटयूट यानी एफटीआईई या फिर सेंसर बोर्ड हो या सीवीसी सरीखे संस्थान, हर जगह जिन हाथो में बागडोर दी गई उनके काम के अनुभव या बौद्दिक विस्तार का दायरा उन्हें संस्थान से ही अभी ज्ञान अर्जित करने को कहता है लेकिन आने वाली पीढ़ियों को जब वह ज्ञान बांटेंगे तो निश्चित ही वही समझ सामने होगी जिस समझ की वजह से उन्हे पद मिल गया। तो फिर आने वाला वक्त होगा कैसा या आने वाले वक्त में जिस युवा पीढ़ी के कंघों पर देश का भविष्य है अगर उसे ही लंबे वक्त तक सत्ता अपनी मौजूदगी को श्रेष्ठ बताने वाले शिक्षकों की नियुक्ति हर जगह कर देती है तो फिर बचेगा क्या। यह सवाल अब इसलिये कही ज्यादा बड़ा हो चला है कि राजनीतिक सत्ता यह मान कर चल रही है कि उसकी दुनिया के अनुरुप ही देश को ढलना होगा। तो कालेजों में उन छात्रों को लेक्चरर से लेकर प्रोफेसर बनाया जा रहा है, जो छात्र जीवन में सत्ताधारी पार्टी के छात्र संगठन से जुड़े रहे हैं। यानी मौजूदा वक्त बार बार एक ऐसी लकीर खींच रहा है जिसमें सत्ताधारी राजनीतिक दल या उसके संगठनों के साथ अगर कोई जुड़ाव आपका नहीं रहा तो आप सबसे नाकाबिल हैं। या आप किसी काबिल नहीं है।

मुस्किल तो यह है कि समझ का यह आधार अब आईएएस और आईपीएस तक को प्रभावित करने लगा है। बीजेपी शासित राज्यों में कलेक्टर, डीएम एसपी तक संघ के पदाधिकारियो के निर्देश पर चलने लगे है। ना चले तो नौकरी मुश्किल और चले तो सारे काम संघ के विस्तार और सत्ता के करीबियों को बचाने के लिये। तो क्या चुनी हुई सत्ता ही लोकतंत्र की सही पहचान है। ध्यान दें तो मौजूदा वक्त में भी मोदी सरकार को सिर्फ 31 फीसदी वोट ही मिले। वहीं जिन संवैधानिक संस्थानों को लेकर मनमोहन सिंह के दौर में सवाल उठे थे तब काग्रेस को भी 70 करोड़ वोटरों में से महज साढे ग्यारह करोड ही वोट मिले थे। बावजूद इसके कांग्रेस की सत्ता से जब अन्ना और बाबा रामदेव टकराये तो कांग्रेस ने खुले तौर पर हर किसी को चेतावनी भरे लहजे में वैसे ही तब कहा था कि चुनाव लड़कर जीत लें तभी झुकेंगे। लेकिन मौजूदा वक्त भारतीय राजनीति के लिये इसलिये नायाब है क्योंकि जनादेश के घोड़े पर सवार मोदी सरकार ने अपना कद हर उस साथी को दबा कर बडा करने की कवायद से शुरु की जो जनादेश दिलाने में साथ रहा और जो सवाल कांग्रेस के दौर में बीजेपी ने उठाये उन्ही सवालो को मौजूदा सत्ता ने दबाने की शुरुआत की।

दरअसल पहली बार सवाल यह नहीं है कि कौन गलत है या कौन सही। सवाल यह चला है कि गलत सही को परिभाषित करने की काबिलियत राजनीतिक सत्ता के पास ही होती है और हर क्षेत्र के हर संस्थान का कोई मतलब नहीं है क्योंकि विकास की अवधारणा उस पूंजी पर जा टिकी है जो देश में है नहीं और विदेश से लाने के लिये किसान मजदूर से लेकर उद्योगपतियो से लेकर देसी कारपोरेट तक को दरकिनार किया जा सकता है। तो मौजूदा वक्त में सत्ता के बदलने से उठते सवाल बदलते नजरिये भर का नहीं है बल्कि सत्ता के अधिक संस्थानों को भी सत्ता की ताकत बनाये रखने के लिये कही ढाल तो कही हथियार बनाया जा सकता है और इसे खामोशी से हर किसी को जनादेश की ताकत माननी होगी क्योंकि यह आपातकाल नहीं है।

 
Leave a comment

Posted by on July 4, 2015 in Uncategorized

 

दो बजट, एक दिशा

मोदी सरकार द्वारा पेश रेल बजट व केन्द्रीय बजट को बहुतों ने दिशाहीन करार दिया है। खासकर संप्रग से जुड़े दलों ने लेकिन इन दोनों बजटों की दिशा बहुत ही स्पष्ट है और पूर्ववर्ती कांग्रेस नीत सरकार की नीतियों की संगति में ही है और वह है निजीकरण-उदारीकरण-वैश्वीकरण की दिशा में इस नीतिगत दिशा को वामपंथ ने खासतौर से रेखांकित किया है और इसीलिए मोदी सरकार को संप्रग-2 की सरकार का विस्तार भी कहा जा रहा है।
M_Id_475575_Arun_Jaitley_2imagesदोनों बजटों के तमाम ब्यौरे अब पूरी तरह से उजागर हो चुके हैं। बजट का मकसद केवल आय-व्यय का लेखा-जोखा रखना भर नहीं होताए बल्कि मुख्य मकसद तो यह बताना होता है कि राजकोष में आ रही आय का पुनर्वितरण किस तरह से किया जा रहा है, भारत जैसे विकासशील देश में जो प्राकृतिक संसाधनों तथा मानवीय क्षमता से भरपूर है, लेकिन जहां गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा जैसी सामाजिक बीमारियों की जड़ें बहुत गहरी है, जहां आर्थिक असमानता बड़े पैमाने पर मौजूद है और इन बीमारियों व असमानता से पैदा हो रही चुनौती पहले के किसी भी समय के मुकाबले बहुत बड़ी है, आय का पुनर्वितरण ही बजट का मुख्य मकसद हो सकता है। इस नज़रिए से ये बजट पूर्ववर्ती सरकार की नीतिगत दिशा को ही बड़ी कठोरता से आगे बढ़ाती है, जबकि इस दिशा को संघ-भाजपा ने अपने अभियान में देश की रूग्णता के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

पेट पर बेल्ट कसने का आह्वान और देशहित में कठोर और कड़वे फैसले की बात करना हमारे देश के पूंजीपति-भूस्वामी शासक वर्ग की धूर्त चाल है।
इन तर्कों को केंद्र में सत्तासीन हर पार्टी बखानती रही है। अटल सरकार ने भी ऐसे ही तर्क सामने रखे थे, मनमोहन सिंह ने भी यही किया था और अब इन्हीं धूर्त तर्कों को मोदी दुहरा रहे है। स्पष्ट है कि यदि आप देश के हितों को अम्बानी-अडानी-टाटा के हितों से एकमेक करते है, तो कठोर और कड़वे फैसले उस बहुसंख्यक जनता के लिए ही होंगेए जो दिन-रात की मेहनत के बाद भी अपना पेट भरने में अक्षम है, लेकिन फिर भी बेल्ट उसी के पेट पर कसी जा रही होगी। दुर्भाग्य से ऐसा ही है वाकई में भाजपा सरकार देश की चिंता में दुबला रही है, जो काम पिछले दस वर्षों में करने का साहस कांग्रेस चाहते हुए भी नहीं कर सकी, वह काम डेढ़ महीने की मोदी सरकार ने कर दिखाया। स्देवशी का जाप करने वाली संघ-भाजपा ने रक्षा जैसा संवेदनशील क्षेत्र भी नहीं छोड़ा और 100 प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को मंजूरी दे दी। रेल और बीमा में तो एफडीआई आएगी ही अब सार्वजनिक बैंकों के शेयरों को बेचकर भी सरकारी घाटे की प्रतिपूर्ति की जाएगी और इस प्रकार बैंकों पर सरकारी नियंत्रण तो ढीला किया ही जायेगा, पिछले दरवाजे से उसके निजीकरण का रास्ता भी साफ किया जायेगा। लेकिन एफडीआई और निजीकरण की लहर पर सवार ये सरकार हमारी अर्थव्यवस्था में कितनी विदेशी मुद्रा का प्रवाह करवा पायेगी। इस बारे में बजट चुप है और अतीत इतना मुखर कि ऐसे कदमों से हमारी अर्थव्यवस्था को कभी कोई संजीवनी नहीं मिली। उलटे विदेशी पूंजी की सट्टाबाजारी ने देश की अर्थव्यवस्था का बेड़ा गर्क़ ही किया है। उसे कमजोर व अस्थिर ही किया है।

अब हमारे देश के बैंकों से ये आशा नहीं की जानी चाहिए कि विश्व अर्थव्यवस्था के झटकों से वह इस देश की अर्थव्यवस्था को बचा लेगी। लगभग 1.64 लाख करोड़ रूपये की कुल कमाई वाले रेलवे के पास 350 से अधिक परियोजनाएं लंबित हैं, जिसके लिए 1.82 लाख करोड़ रुपये की जरूरत है। ये परियोजनाएं चाहे किसी भी सरकार के समय बनी हो, आम जनता की यात्रा-सुविधाएं सुरक्षा तथा संरक्षा से जुड़ी है, जबकि रेलवे की आय का 94। इसके संचालन में ही व्यय हो रहा है। रेलवे की बचत से ही इसे पूरा करने जाएं तो कम-से-कम 20 साल लगेंगे और तब तक हमें किसी अन्य परियोजना की परिकल्पना भी नहीं करनी चाहिए, लेकिन यदि आपके पास रेलवे में निवेश के स्रोत है, तो हमारी प्राथमिकता इन परियोजनाओं को पूरा करने की ही हो सकती है। लेकिन मोदी सरकार के लिए देशहित इसमें निहित है कि रेल क्षेत्र में जिस विदेशी निवेश को लाया जा रहा है, उसके जरिये 60,000 करोड़ रूपये की लागत वाली एक बुलेट ट्रेन चलाई जाये! और वे इसकी लागत उस आम जनता से वसूल करेंगे, जो सपने में भी ऐसी ट्रेनों में पैर नहीं रख सकती, इस सरकार के लिए देशहित इसी में है कि खटारा ट्रेनों में झूलते-लटकते-मरते बढ़े किरायों के साथ सफ़र करें। लगभग 18 लाख करोड़ रूपयों के आकार वाले केन्द्रीय बजट में विभिन्न मदों पर चना-मुर्रा के समान 50 करोड़ 100 करोड़ या 200 करोड़ रूपयों के आवंटन से यह तो साफ है कि सरदार पटेल की मूर्ति लगाने को छोड़कर और कुछ नहीं हो पायेगा।

गांवों को 24 घंटे बिजली आपूर्ति, खाद्यान्न उत्पादन की क्षमता बढ़ाने, शहरी महिलाओं की सुरक्षा करने, खेलों को प्रोत्साहित करने, लड़कियों को पढ़ाने, जलवायु परिवर्तन से होने वाली समस्याओ से निपटने आदि के तमाम दावे थोथे वादे बनकर रह जाने वाले हैं। देशहित में जनता को अभी गरीबी, बेरोज़गारी, अशिक्षा, भूखमरी से निजात पाने और अपने जल, जंगल, जमीन व खनिज के बल पर स्वदेशी विकास का सपना देखने को तिलांजलि दे देनी चाहिए, देशहित में जरूरी है अभी उद्योगों का विकास और इसके लिए फिर से सेज को पुनर्जीवित किया जा रहा है, भूमि अधिग्रहण कानून, पर्यावरण कानूनों आदिवासी वनाधिकार कानून के प्रावधानों को कमज़ोर करके इसके लिए मोदी सरकार के पास नए उद्योगों के लिए 10,000 करोड़ रूपयों का फंड है, तो बिजली कंपनियों के लिए 10 साल तक हॉलिडे टैक्स का उपहार भी। जिस काले धन को चुनावी मुद्दा बनाया गया था, उस पर अब संघ-भाजपा-मोदी खामोश है, लेकिन कांग्रेसी राज के समान ही पूंजीपतियों को टैक्स में भारी राहत जारी है और इस राहत भरे टैक्स में भी बिना अदा किये गए टैक्स की वसूली की कोई योजना नहीं है। यही राशि 10 लाख करोड़ रूपयों से ऊपर बैठती है।

18 लाख करोड़ के बजट में यदि 10 लाख करोड़ रूपये देशहित में पूंजीपतियों को सौंप दिए जाएं. चाहे उपहार समझकर या फिर सब्सिडी कहकर तो खजाना तो खाली रहना ही है, आम जनता के लिए ये खजाना कांग्रेसी राज में भी खाली थाए संघ। भाजपा के राज में भी खाली ही रहेगा। इसीलिए जब इस वर्ष मानसून अनुकूल नहीं है, तब भी लोगों की रोजी-रोटी और अकाल से निपटने की समस्या इस सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। मनरेगा जैसे कानून, जिसकी पूरी दुनिया में प्रशंसा हुई है… बावजूद इसके इसमें तमाम खामियां हैं और लचर क्रियान्वयन के खिलाफ इस सरकार का दृष्टिकोण सामने आ चुका है। आने वाले वर्षों में निश्चित ही इसकी वैधानिकता को ख़त्म करने का प्रयास किया जायेगा। लेकिन इस बार के बजट में भी मात्र 33990 करोड़ रूपये आवंटित किये गए हैं। पिछले वर्ष के बजट आवंटन से मात्र 990 करोड़ रूपये ज्यादा और मुद्रास्फीति के मद्देनज़र वास्तविक आवंटन पिछले बार से कम सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को ध्यान में रखते हुए यदि औसत मजदूरी 200 रूपये प्रतिदिन ही मानी जाएं तो भी इस बजट आवंटन से 100 करोड़ मानव दिवस से ज्यादा रोजगार का सृजन नहीं हो सकता, जबकि वर्ष 2009.10 में भी 283 करोड़ श्रम दिवसों; मनरेगा के इतिहास में सबसे ज्यादा का सृजन किया गया था। स्पष्ट है की इस अकाल वर्ष में पिछले वर्ष के मुकाबले बहुत कम रोजगार का ही सृजन होने जा रहा है।

योजना आयोग के खिलाफ भी मोदी सरकार का रूख स्पष्ट है और इसे अलविदा कहने की तैयारी की जा रही है। केन्द्रीय बजट में भी इसकी झलक स्पष्ट दिखती है। इस देश के संतुलित विकास, सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता के लिएए केन्द्र-राज्यों के बीच संसाधनों व आय के वितरण व संघीय ढांचे की रक्षा की दिशा में योजना की परिकल्पना बहुत ही महत्वपूर्ण है, लेकिन कुल बजट आवंटन में आयोजना व्यय का जो हिस्सा पिछले वर्ष 35 फीसदी था, वह इस बार के बजट में घटकर 32 फीसदी रह गया है। आने वाले वर्षों में इसमें तेजी से गिरावट होगी और नियोजित विकास शोध की विषय-वस्तु बनने जा रही है।

इसी प्रकार इस सरकार का अल्पसंख्यक विरोधी रूख भी स्पष्ट झलकता है। संप्रग सरकार ने पिछले वर्ष अल्पसंख्यकों की शिक्षा के लिए जहां 150 करोड़ रूपये आवंटित किये थे, वहीँ संघ-भाजपा सरकार ने अल्पसंख्यकों की शिक्षा को मदरसा आधुनिकीकरण तक सीमित कर दिया है और मात्र 100 करोड़ रूपये ही आवंटित किये हैं। और यह तो सबको मालूम है कि बजट में जिस मद में जितनी राशि का प्रावधान किया जाता है, वास्तव में उतने का कभी उपयोग नहीं होता। कुल मिलाकर, नियोजित विकास की उपेक्षा या विदाई का अर्थ है… आम जनता की बुनियादी समस्याओं, पेयजल, आवास, रोजगार, सिंचाई की अनदेखी और तिरस्कार, इस विदाई का शोक गीत अभी लिखा जाना बाकी है।

 
Leave a comment

Posted by on July 18, 2014 in Uncategorized

 

वित्त मंत्री जेटली का बजटीय भाषण तथा प्रस्तुत बजट

वित्त मंत्री जेटली के बजटीय भाषण तथा प्रस्तुत बजट ने जनता की आशाओं, उम्मीदों तथा आकांक्षाओं को निराशा में बदल दिया है। जो सरकार महँगाई छू मन्तर करने के वायदे के आधार पर सत्ता में आई, उसने सत्ता में आने के दो महीनों के अन्दर महँगाई कम करने के स्थान पर कमरतोड़ महँगाई बढ़ा दी। जेटली ने बजट में कीमती पत्थर, हीरा तथा पैक्ड फूड सस्ता कर दिया। मेरा सवाल है कि इससे देश के गरीब आदमी तथा नव मध्यम वर्ग को क्या फायदा पहुँचेगा। क्या यह देश के गरीब आदमी के साथ भद्दा मजाक नहीं है।

चुनावकेवल वायदों पर जीता गया। जीतने के बाद महँगाई कम करने के स्थान पर आशातीतमहँगाई बढ़ा दी गई। उसी प्रकार बजट केवल घोषणाओं से भरा है। सामाजिकसरोकारों की जिन योजनाओं के लिए वित्त मंत्री ने जिस राशि की घोषणा की है M_Id_475575_Arun_Jaitley_2उसको सुनकर लग रहा था कि यह भारत का बजट नहीं है, किसी महानगर का बजट है।कीमती पत्थर और हीरे सस्ते कर दिए, पैक्ड फूड सस्ता का दिया। बहुत अच्छाकिया वित्त मंत्री ने। अब देश का आम आदमी, जिसकोध्यान में रखकर बजट बनाने का दावा किया गया, बजट के बाद कीमती पत्थर औरहीरे तथा पैक्ड फूड खरीद सकेगा। पिछले साल चिदम्बरम के बजट के बाद जेटली नेबार बार कहा कि आयकर की छूट सीमा कम से कम 5लाख होनी चाहिए थी। अब क्याहुआ। ऊँट के मुँह में जीरा। देश पर अकाल की छाया मँडरा रही है। उससे निबटनेके लिए कोई सकारात्मक सोच नहीं है। बेरोजगारी दूर करने के लिए कोई सोचनहीं है। घर चलाने वाली महिलाओं की पीड़ा को कम करने की कोई सोच नहीं है।वोट आम आदमी के नाम पर। फायदा कॉरपोरेट घरानों को। सामाजिक सराकोरों से सम्बंधित 28 योजनाओं के लिए आपने सौ सौ करोड़ की लोलीपोप घोषणाएँ कर दीं। आप भारत का बजट पेश कर रहे थे अथवा अमृतसर शहर का बजट पेश कर रहे थे।

वित्त मंत्री जेटली ने खुद स्वीकारा था कि देश में आलू और प्याज की पैदावार भरपूर हुई है और देश में इनके दाम बढ़ने का कारण जमाखोरी है। हमने लिखा था कि हम जेटली के आकलन से सहमत हैं। हमने अपने लेख में लिखा था कि आखिरकारभाजपा ने भी यह स्वीकार कर लिया कि महँगाई का बहुत बड़ा कारण जमाखोरी एवंबिचौलिए हैं। सरकार का आकलन ठीक है। हम इससे सहमत हैं। हम बहुत पहले सेकहते और लिखते आए हैं कि किसान की किसी उपज को यदि उपभोक्ता दस रुपए मेंखरीदता है तो किसान को अपनी उपज का केवल दो रुपया ही मिल पाता है। उत्पादकएवं उपभोक्ता के अलावा बाकी का मुनाफा कौन चट कर जाता है। धूमिल की कविताकी पंक्तियाँ हैं -एक आदमी रोटी बेलताहै। एक आदमी रोटी खाता है। एक तीसरा आदमी भी है। जो न रोटी बेलता है न रोटी खाता है। वह सिर्फ रोटी से खेलता है।विचारणीय है कि रोटी से खेलने वाला आदमी एकनहीं, वे अनेक बिचौलिए हैंजिनके अनेक स्तर हैं और हरेक स्तर पर मुनाफावसूली करने का धंधा होता है।रिटेल व्यापार में मिलावट करने, घटिया तथा डुप्लीकेट माल देने, कम तौलनेआदि की शिकायतें भी आम हैं। हमारी अर्थ व्यवस्था में जो दुर्दशा किसान कीहै वैसी ही स्थिति अन्य कामधंधों/ पेशों के कामगारों/ कारीगरों की है।सरकार ने कागजी व्यवस्था कर दी है कि किसान मण्डी में जाकर अपनी फसल सीधेग्राहक को बेच सकते हैं। इस व्यवस्था को असली जामा पहनाने की जरूरत है।किसान को मण्डी के कमीशन एजेन्टों के चंगुल से छुड़ाने के लिए मण्डी कीवर्तमान व्यवस्था को बदलने की जरूरत है। यह नियम बनाना होगा कि किसान मण्डीमें बिना कमीशन एजेन्ट को मौटी रकम दिए प्रवेश कर सके तथा हर मण्डी मेंकिसानों को अपना माल बेचने के लिए स्थान बनाना होगा। यह व्यवस्था स्थापितकरनी होगी जिससे रोटी बेलने वाले तथा रोटी खाने वाले के बीच के बिचौलिएमुनाफावसूली का काला धंधा न कर सकें। इससे भाजपा पर जो आरोप लगता रहा है किभाजपा जमाखोरों एवं बिचौलियों की पार्टी है, उस आरोप के काले दाग धुलसकेंगे।

किसान तथा गाहक के बीच के मुनाफाखोर बिचौलियों, मण्डी के दलालों तथा जमाखोरों के शोषण से निजात दिलाने के लिए बजट में कोई ´विजन’ नहीं है। वित्त मंत्री कहते हैं कि किसान मण्डी में जाकर सीधे अपना माल ग्राहक को बेच सकते हैं। मगर किसान मण्डी में जाकर, एजेन्ट एवं दलालों को भेंट चढ़ाए बिना, अपना माल सीधे ग्राहक को बेच सकें – इसके लिए बजट में कोई दिशा अथवा प्रयास अथवा संकेत नहीं है। वित्त मंत्री जी, आप यह व्यवस्था कर दीजिए। महँगाई अपने आप कम हो जाएगी। मगर इसके लिए ´दृढ़ इच्छा शक्ति’ चाहिए। इसके लिए आम आदमी के सराकोरों को पूरा करने का जज्बा होना चाहिए।

दैनिक उपभोग की वस्तुओं की वस्तुओं की महँगाई को रोकने के लिए बजट में कोई ´विजन’ नहीं है। यह बजट देश के आम आदमी, घर चलाने वाली महिलाओं, बेरोजगारों तथा युवाओं की जन आकाक्षाओं को चूर चूर करने वाला है।

सत्ता प्राप्त करने के पहले भाजपा के नेता बार बार चिल्लाते थे कि गरीब किसानों को ब्याज मुक्त ऋण मिलने की व्यवस्था होनी चाहिए। इस बजट में वह व्यवस्था नदारद है। यह बजट गरीब किसानों की आशाओं पर कुठाराघात है।

मोदी सरकार को मन मोहन सरकार का आभारी होना चाहिए कि मन मोहन सिंह की सरकार से मोदी की सरकार को विरासत में 698 लाख टन का खाद्यान्न भंडार मिला है। आप इसका बीस प्रतिशत भाग भी बाजार में उतार दीजिए। जमाखोरों की हालत पतली हो जाएगी। मगर इसके लिए भी ´दृढ़ इच्छा शक्ति’ चाहिए। जमाखोरों की नाराजगी को झेलने के लिए कलेजा चाहिए।

मन मोहन सिंह की सरकार और मोदी की सरकार के बजट में एक अन्तर जरूर है। मन मोहन सिंह की सरकार जो योजनाएँ कांग्रेसी नेताओं के नाम पर चला रही थी अब मोदी की सरकार उन्हीं योजनाओं को श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीन दयाल उपाध्याय के नाम पर चलाएगी। गाँवों को शहर से जोड़ने वाली ´प्रधान मंत्री ग्राम सड़क योजना’ के अन्तर्गत चिदम्बरम ने जितनी धनराशि का प्रावधान किया था उसमें आपने जबर्दस्त कटौती अवश्य कर दी। यह दर्शाता है कि भारत के गाँवों और किसानों तथा मजदूरों के हितों के प्रति आप कितने गम्भीर हैं।

देश के आम बजट में महिलाओं की सुरक्षा के लिए 100 करोड़ का प्रावधान करते समय देश के वित्त मंत्री को शर्म नहीं आई। आप योजना का नाम गिनाने के लिए वित्तीय बजट पेश कर रहे थे। देश की महिलाओं की सुरक्षा की योजना के कार्यान्वयन और निष्पादन के लिए मोदी की सरकार कितनी संजीदा है- यह 100 करोड़ के झुनझुना से स्पष्ट है।

बजट में काले धन की उगाही के लिए किसी कार्यक्रम अथवा प्रयास अथवा योजना के लिए कोई दिशा संकेत नहीं है। आम चुनावों के दौरान अपने को भारत का ‘चाणक्य´ मानने वाले तथा अपने को बाबा कहने वाले सज्जन ने बार बार उद्घोष किया कि विदेशों में इतना कालाधन जमा है कि अगर मोदी जी की सरकार आ गई तो देश की तकदीर बदल जाएगी, बीस वर्षों तक किसी को आयकर देना नहीं पड़ेगा, हर जिले के हर गाँव में सरकारी अस्पताल खुल जाएँगे, कारखाने खुल जाएँगे, बेरोजगारी दूर हो जाएगी तथा देश की आर्थिक हालत में आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि सोनिया गाँधी के इशारों पर चलने वाली सरकार के पास उन तमाम लोगों की सूची है जिनका काला धन विदेशों के बैंकों में जमा है। उस सूची कोसोनिया की सरकार जगजाहिर नहीं कर रही क्योंकि उस सूची में जिनके नाम हैं उनको यह सरकार बचाना चाहती है। आदि आदि।

अब तो मोदी की सरकार है। काले धन वालों की कोई सूची जग जाहिर क्यों नहीं की गई। क्या यह सरकार अपने लोगों को बचा रही है। कड़वी दवा पिलाने की जरूरत नहीं है। वर्ष 2014-2015 के अंतरिम बजट में कॉरपोरेट अर्थात् उद्योग जगत के लिए पाँच लाख करोड़ से अधिक राशि का प्रावधान किया गया है। निश्चित राशि है – 5.73 लाख करोड़। देश का वित्तीय घाटा इस राशि से बहुत कम है। सम्भवतः 5.25 लाख करोड़। कॉरपोरेट अर्थात् उद्योग जगत के लिए अतिरिक्त कर छूट के लिए निर्धारित अंतरिम बजट में जिस राशि का प्रावधान किया गया है उसको यदि समाप्त कर दिया जाता तो न केवल सरकार का वित्तीय खाटा खत्म हो जाता अपितु उसके पास पचास हजार करोड़ की अतिरिक्त राशि बच जाएगी। कॉरपोरेट जगत को दी गई कर रियायत को समाप्त करने की स्थिति में सरकार को डीजल के दाम बढ़ाने की जरूरत नहीं होती, रसोई गैस, पैट्रोल, उर्वरक, खाद्य सामग्री पर जारी सब्सिडी को कम करने के बारे में नहीं सोचना पड़ता (जिसको जनता के भारी विरोध को देखते हुए तीन महीनों के लिए स्थगित कर दिया गया है) तथा रेल का बेताहाशा तथा पूर्ववर्ती सभी रिकोर्डों को ध्वस्त करते हिए यात्री किराया तथा माल भाड़ा बढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ती। हम भूले नहीं हैं कि चुनाव के नतीजे आने के बाद दिल्ली की आम सभा में जाकर वर्तमान वित्त मंत्री जेटली ने रामदेव की तुलना महात्मा गाँधी तथा जय प्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों से कर डाली। इससे जनता में यह संदेश गया कि नव निर्वाचित सरकार आते ही विदेशी बैंकों में अपना काला धन जमा करने वाले तमाम लोगों की सूची जाहिर कर देगी तथा सारा धन भारत आ जाएगा। इससे देश की तकदीर बदल जाएगी, बीस वर्षों तक हमें आयकर देना नहीं पड़ेगा, हर जिले के हर गाँव में सरकारी अस्पताल खुल जाएँगे, कारखाने खुल जाएँगे, बेरोजगारी दूर हो जाएगी तथा देश की आर्थिक हालत में आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। जनता को किसी कमीशन से मतलब नहीं होता। जनता को वे परिणाम चाहिएँ जिनके घटित होने का उसे बार बार आश्वासन मिल चुका था। यदि सरकार मानती है कि चुनावों में रामदेव ने जनता को भ्रमित किया था तो सरकार ने रामदेव के खिलाफ धोखाधड़ी का आपराधिक मुकदमा दायर क्यों नहीं किया। इसके विपरीत जेटली ने, जो भारत सरकार के वित्त मंत्री हैं, ने रामदेव की तुलना महात्मा गाँधी एवं जयप्रकाश नारायण जैसे महापुरुषों से करने का पाप कर्म कर डाला। सूची की बात जाने दीजिए। बजट में काले धन की उगाही के लिए संकेत भी नहीं है।

चुनावों में बार बार कहा गया कि देश हित में कठोर आर्थिक फैसलों को टालकर देश द्रोह का काम कर रही है। रेलके बढ़ाए गए किरायों में मुंबई की लोकल ट्रेनों के किरायों की बढ़ोतरी भीशामिल थी। महाराष्ट्र एवं मुम्बई के संसद सदस्यों एवं भाजपा के नेताओं नेअडिग मोदी से मुलाकात की तथा मोदी को समझाया कि इस निर्णय का महाराष्ट्रमें होने वाले विधान सभाओं के चुनावों पर विपरीत असर पड़ेगा। अपने निर्णयपर अडिग रहने वाले मोदी की सरकार ने मुंबई की लोकल ट्रेनों के बढ़े हुएकिरायों में कटौती की घोषणा कर दी। यदि मन मोहन सिंह की सरकार चुनावों कोध्यान में रखकर आर्थिक फैसलों को टाले तो वह देश की दुश्मन है और वही काममोदी की सरकार करे तो उसे किस उपाधि से नवाजा जाए।

बजट में, सरदार वल्लभभाई पटेल की प्रतिमा के निर्माण के लिए 200 करोड़ का प्रावधान है। गुजरात के मुख्य मंत्री मोदी ने केशूभाई पटेल के वोट बैंक में सैंध लगाने के लिए सरदार पटेल की प्रतिमा बनाने का संकल्प दौहाराया था। मोदी ने कहा था कि हम गुजरात में देश के लाखों किसानों के दान से प्रतिमा बनाएँगे। अब देश के बजट में 200 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इस सम्बंध में, मैं यह कहना चाहता हूँ कि भारत के स्तर पर विश्व की सबसे ऊँची प्रतिमा सरदार पटेल की नहीं अपितु सरदार पटेल के आराध्य तथा राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जी की बननी चाहिए।

आम आदमी को चाहिए कि वह अपना पेट भर सके। अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ा सके। बीमार होने पर अपना ईलाज करा सके। बेरोजगार को नौकरी चाहिए।वित्त मंत्री जी, आप बताइए कि इनके लिए आपके बजट में क्या है। वित्त मंत्री जी से उम्मीद थी कि वह बजट में जन आकांक्षाओं का ध्यान रखेंगे। देश में बजट से नई आशा एवं नए विश्वास का भाव पैदा होगा। मगर वित्त मंत्री जी ने क्या तस्वीर पेश की। आपने कहा कि अनिश्चितता की स्थिति है, इराक का खाड़ी संकट है, कमजोर मानसून की स्थिति है। उनके बजटीय भाषण ने आशा और विश्वास पैदा करने के स्थान पर घनघोर अंधकार और निराशा का वातावरण पैदा कर दिया। गए थे हरि भजन को, ओटन लगे कपास। परिणाम सबके सामने हैं। कॉरपोरेट घरानों को तमाम तरह की सुविधाएँ देने के बावजूद बजट के बाद शुरुआती चढ़ाव के बाद शेयर मार्किट में गिरावट देखने को मिली।

 
Leave a comment

Posted by on July 15, 2014 in Uncategorized

 

शुरूआत के दिनों में नई सरकार

बड़े समर्थन और विशाल जनादेश वाली मोदी की सरकार अपने शुरुआती दौर में ही है। कहा जाता है कि सवेरा दिन का और बचपना जवानी का संकेत तो देता ही है। आम बजट से पूर्व मोदी सरकार का कार्यकाल आम जनताओं के लिये कही से कहीं तक राहत वाला नहीं कहा जा सकता। भारत की आम जनता ने जिस परेशानी से निजात हासिल करने के लिये भारी मतदान किये थे। और जिस अच्छे और आसान दिनों की बात की गई थी। दावे किये गये थे कि वह सब कुछ करने में समर्थ और सक्षम हैं। उन दावों की पोल खुलने लगी है। बजट से पूर्व जनता की हालत बेहाल है ओर जनता ने इन चंद दिनों में महंगाई की इतनी कठोर मार देखी है कि उन्हें पिछली सरकार का दस वर्ष, वर्तमान बोझ की अपेक्षा हल्का लगने लगा है। जनता को यह सब कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि बजट के बाद किया होगा ?

हां, इस दौरान कुछ चीजें और परिदृश्य कुछ अलग है। जनता के बीच और उन के मन में निराशा और गुस्सा एक साथ है। मीडिया और राजनीति पार्टियां खामोश है। जनता मन ही मन सी महसूस करने लगी है, अभी पार्टी और सरकार अपने-आप को फिर करने में लगी है। अभी दौर बड़े बड़े पदों पर अपने अपनों को बैठाने और राजपालों के बदलने का है। कभी-कभी तिलमिलाहट और झल्लाहट में सरकार में शामिल लोग महंगाई के लिए और बेकाबू होती अर्थव्यवस्था के लिए पिछली सरकारों को कोस देते हैं तो कभी मानसून और प्रकृति को महंगाई के लिये जिम्मेदार बताते हैं।

सरकार देश में किसी भी प्रकार की खाद्य की कभी की बात नहीं करती। साथ ही जमाखोरी और अव्यवस्था की बात भी स्वीकारती है। सरकार की ओर से बड़े-बड़े कठोर फैसलों और कठोर कदम उठाने की बात होती है। मगर महंगाई जिस रफ्तार से बढ़ती थी, वर्तमान सरकार के अधीन महंगाई की गति ने रिकॉर्ड बना डाला है। सरकार के प्रति, उनके मंत्रियों के प्रति, सुधर और काम के प्रति लोगों में निराशा बढ़ता ही जा रहा है। अब तो आम चर्चाओं में, खेत खलिहानों में, चाय की दुकानों पर लोग अच्छे दिन आने वाले हैं- को मजाक के तौर पर प्रयोग करने लगे हैं। मगर आप को यकीन न आये तो आज सरकार सर्वे करवा करके देखे। उनका समर्थन करने वाली आम जनता उनके शुरू के काम काज से न तो संतुष्ट है और न ही खुश। अभी ऐसा लगता है कि स्वतंत्रा रूप से न तो मंत्रालय काम कर रहा है और न ही नौकरशाही, क्योंकि सभी तंत्रा को प्रधानमंत्री कार्यालय की अनुमति की दरकार है और ऐसी स्थिति में सुचारू रूप से सुगमतापूर्वक कामकाज संभव नहीं है।

मैं न तो मोदी सरकार का आलोचक हूं और न ही मैं जल्दी में ही हूं। मेरा समर्थन पत्राकार बिरादरी से है और जो घटना घटित होते देखता हूं, अपने अन्तरात्मा की आवाज से कलम चलाता हूं। अब तो ऐसा लगने लगा है कि काम करने, कदम उठाने और बात करने में बहुत अन्तर है दावा करना और उसे हकीकत का जामा पहनाना दोनों बातें जुदा हैं। सबको साथ लेकर चलने की बात और हकीकत दोनों बड़े दूर की बात है। सम्पूर्ण देश का एक समान विकास रेल बजट और रले बजट में कुछ गैर भाजपा शासित प्रदेशों के साथ भेदभाव हकीकत की परते खोलने के लिए कापफी है। रेल बजट में उन प्रदेशों की उपेक्षा हुइ्र है। जिस प्रदेशों ने पूर्ण बहुमत दिलाने में अपना प्रमुख योगदान दिया है।

देश और देश की जनता सिर्फ देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर निगाहे टिकाये हुए हैं। आमजन प्रधानमंत्री और उनकी कार्यालय की ओर टकटकी लगाये हुए हैं कि वादे तो दूर की बात है जो सपने दिखाये गये थे। जो कुछ कर गुजरने का जजबा और जोश चुनाव प्रचार के क्रम में दिखाया गया था। वह सब बाद की बातें हैं जिस अवस्था में देश की बागडोर प्राप्त हुई थी, कम से स्थिति को राहत न भी दिया जाये, स्थिति यथावत तो सरकार बनाने रखे।

गौर जरा सी बात पर बरसों के याराने गये।
लेकिन इतना तो हुआ कि कुछ लोग पहचाने गये।।
कुछ लोग जो सवार है कागज की नाव पर।
तोहमत तराशते हैं हवा के दवाब पर।।
हर कदम पर नित नये सांचे में ढल जाते हैं लोग।
देखते ही देखते कितने बदल जाते हैं लोग।

 
Leave a comment

Posted by on July 15, 2014 in Uncategorized

 

‘एडमिरल गोर्शकोव’ से ‘आईएनएस विक्रमादित्य’ तक का सफ़र : हमने क्या खोया क्या पाया?

Vikramaditya1इस गौरवशाली भीमकाय एयरक्राफ्ट करियर को रूस ने 1987 में आधिकारिक तौर पर सेना शामिल किया. उस समयइसका नाम ‘बाकू’ रखा गया. सोवियत यूनियन के ख़त्म होने के बाद नवम्बर 1990 में इसी जहाज़ का नाम बदल कर ‘एडमिरल गोर्शकोव’ रखा गया.

1994 के शुरुआती समय में जहाज़ में स्टीम तैयार करने वाले बॉयलर में एक ज़बरदस्त विस्फोट हो जाने के कारण ये भीमकाय मशीन मरम्मत के लिए करीब डेढ़ साल तक बंदरगाह पर पड़ी रही.1995 के आखिर में इस युद्धपोत को फिर से सेना में वापस लाया गया पर अगले ही साल 1996 में इस जहाज़ के रख-रखाव और परिचालन में होने वाले भारी खर्च के कारण इस गौरवशाली भीमकाय जहाज़ को सेवानिवृत कर दिया गया. सेवानिवृत होने के बाद इस जहाज़ को बेचने के लिए छोड़ दिया गया.

वैसे तो इस युद्धपोत को भारत को बेचने की गहमागहमी 1994 में ही शुरू हो गयी थी, जब इस जहाज़ में हुए ब्लास्ट के कारण ये जहाज़ बंदरगाह पर मरम्मत के लिए पड़ा हुआ था. रूस को अंदाज़ा हो चला था कि अब वो जहाज़ ज्यादा समय का मेहमान नहीं है.

इधर भारत का अपना युद्धपोत विक्रांत 50 साल तक भारतीय नौसेना को अपनी सेवा देने के बाद 1997 के आखिर में सेवानिवृत हो गया था. ऐसे में एक अत्याधुनिक युद्धपोत की ज़रुरत भारत को भी थी. इसी समय रूस ने भारत को अपना युद्धपोत ‘एडमिरल गोर्शकोव’ ‘मुफ्त’ में देने की बात कही. बशर्ते कि भारत उस जहाज़ के आधुनिकीकरण, मरम्मत और उस युद्धपोत में पहले से मौजूद फाइटर प्लेन का खर्च दे दे.

भारत को ये ऑफर बड़ा भाया और नयी दिल्ली तुरंत हरकत में आ गयी. भारत ने नौसेना के अफसरों और वैज्ञानिकों का एक डेलीगेशन युद्धपोत की जांच के लिए रूस भेजा. जांच जल्दी पूरा करके जहाज को खरीदने के लिए हरी झंडी दे दी गयी. लेकिन सरकारी पचड़ो में ये डील होने में थोड़ी देर हो गयी.

सन 2000 में जहाज़ के मरम्मत आदि के कॉन्ट्रैक्ट की कीमत 400 मिलियन डॉलर यानी 24 अरब 48 करोड़ तय की गयी, लेकिन 2004 मे रूस ने ये दाम बढ़ाकर 1.5 बिलियन डॉलर यानी करीब 90 अरब 19 करोड़ 50 लाख रूपये कर दिया गया, जिसमें से 58 अरब 55 करोड़ 68 लाख 80 हज़ार रूपये ‘एडमिरल गोर्शकोव’ के मरम्मत के लिए और बाकी की राशि इस जहाज़ पर मौजूद 16 MIG-29K के मरम्मत के लिए था. इस पुरे प्रोजेक्ट को नाम दिया गया ‘प्रोजेक्ट 11430′.

जल्द ही रूस ने कीमत को फिर बढाने का फैसला किया, जिसके चलते भारत और रूस के रिश्तों में खटास आ गयी. अब तक जहाज़ को ‘मुफ्त’ में देने के नाम पर रूस भारत से 90 अरब 19 करोड़ 50 लाख वसूल चूका था, और अब वो इस कीमत को और बढ़ना चाहता था. रूस ने तर्क दिया कि मरम्मत के लिए हो रहे काम पर मार्केट का असर पड़ रहा है. रूस अब तक 2 कॉन्ट्रैक्ट तोड़ चूका था.

इसके बाद 2010 में फिर एक नयी डील की गयी, जिसमें इस पुरे युद्धपोत के नवीनीकरण की किमत 2.33 बिलियन डॉलर (करीब एक खरब 40 अरब 56 करोड़ 3 लाख) तय की गयी. इसके तहत भारतीय नौसेना को इस जहाज़ के संचालन की ट्रेनिंग देना और साथ में जहाज़ का ब्लू-प्रिंट देना भी शामिल था. पर 45 MIG-29K फाइटर प्लेन के लिए अलग से 2 बिलियन डॉलर (करीब 1 ख़रब 20 अरब 22 करोड़) रखा गया.

मतलब अब ये डील पुरे 4.33 बिलियन डॉलर यानी करीब 2 खरब 60 अरब 31 करोड़ 96 लाख का हो गया. रूस ने दिसंबर 2012 में सारा काम करके इस युद्धपोत को भारत को दे देने का वादा किया. पर जब सब कुछ ठीक करके इस जहाज़ का ट्रायल किया रूस ने तब फिर से जहाज़ के बॉयलर में खराबी आ गयी, जिससे इस जहाज़ की डिलीवरी 12 महीने और टली.

2008 में एक आर.टी.आई के जवाब में भारतीय नौसेना ने माना कि उन्होंने 2004 में बिना अच्छे से जांच किये 1.5 बिलियन डॉलर के कॉन्ट्रैक्ट को मंजूरी दे दी थी. यानी जांच अच्छे से ना हो पाने से कीमत का सही अंदाज़ा नहीं लगा पाए. इसीलिए बाद में जब काम शुरू हुआ तो ज्यादा खर्च आने लगे ज्यादा मशीने बदलने की ज़रुरत पड़ने लगी, जिससे कीमत बढ़ती चली गयी.

जहाज़ खरीदने की जल्दीबाजी में भारत ने अपनी बिगड़ती अर्थव्यवस्था में भी बहुत पैसे बर्बाद कर दिए. अगर सही समय पर सही कीमत का अंदाज़ा लगा पाते तो हो सकता था कि ये डील ही ना होती पर एक ग़लत आकलन से डील शुरू हुई तो कीमत बढ़ती चली गयी. भारत बीच में इस प्रोजेक्ट को छोड़ नहीं सकता था, नहीं तो तब तक के लगाए पैसे भी बर्बाद हो जाते.

खैर, इन सभी बाधाओं और गलतियों के बावजूद ‘एडमिरल गोर्शकोव’  ‘ INS विक्रमादित्य’ बनकर भारत आया. जनवरी 2014 के शुरुआती दिनों में और 15 जून 2014 भारत के नए प्रधानमन्त्री ने इसे देश को सौंपा.

आइये अब जानते हैं हमारी शान बने INS विक्रमादित्य के कौशल के बारे में :

284 मीटर लम्बे इस विशालकाय जहाज ने 22 डेक हैं. ये करीब 3 फूटबाल के मैदान की लम्बाई के बराबर है. इस जहाज़ का 40% हिस्सा ओरिजिनल ‘एडमिरल गोर्शकोव’ का ही है, जबकि बाकी हिस्सा नया है. ये जहाज करीब 60 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ़्तार से चल सकता है. इस जहाज़ पर अभी करीब 36 लड़ाकू विमान रखे जा सकते हैं. जिसमें से अत्याधुनिक MIG -29k भी शामिल है, जो हर मौसम में उड़ान भरने की क्षमता रखता है.

इस वक़्त करीब 200 रुसी अधिकारी करीब 1600 भारतीय नौसैनिकों को इस भीमकाय जहाज़ को संचालित करना सिखा रहें हैं. इन 1600 सैनिकों के लिए हर महीने करीब 1 लाख अंडे, करीब 25 हज़ार लीटर दूध और करीब 20 टन चावल जहाज़ पर लादा जाता है. इसके आने से अरब सागर में भारत की मौजूदगी और मज़बूत हो जाएगी और ज़रुरत के समय जेट प्लेन को उड़ाने के लिए हवाई अड्डे की ज़रुरत नहीं पड़ेगी.

 
Leave a comment

Posted by on June 17, 2014 in Uncategorized